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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 9

191 Sukta
20 Mantra
1/36/9
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृदुपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
सं सी॑दस्व म॒हाँ अ॑सि॒ शोच॑स्व देव॒वीत॑मः । वि धू॒मम॑ग्ने अरु॒षं मि॑येध्य सृ॒ज प्र॑शस्त दर्श॒तम् ॥

सम् । सी॒द॒स्व॒ । म॒हान् । अ॒सि॒ । शोच॑स्व । दे॒व॒ऽवीत॑मः । वि । धू॒मम् । अ॒ग्ने॒ । अ॒रु॒षम् । मि॒ये॒ध्य॒ । सृ॒ज । प्र॒ऽश॒स्त॒ । द॒र्स॒तम् ॥

Mantra without Swara
सं सीदस्व महाँ असि शोचस्व देववीतमः । वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम् ॥

सम् । सीदस्व । महान् । असि । शोचस्व । देववीतमः । वि । धूमम् । अग्ने । अरुषम् । मियेध्य । सृज । प्रशस्त । दर्सतम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (तेजस्विन्) विद्याविनययुक्त (मियेध्य) प्राज्ञ (अग्ने) विद्वन् सभापते ! जो आप (महान्) बड़े-२ गुणों से युक्त (असि) हैं सो (देववीतमः) विद्वानों को व्याप्त होने हारे आप न्याय धर्म में स्थित होकर (संसीदस्व) सब दोषों का नाश कीजिये और (शोचस्व) प्रकाशित हूजिये हे (प्रशस्त) प्रशंसा करने योग्य राजन् आप (विधूमम्) धूम सदृश मल से रहित (दर्शतम्) देखने योग्य (अरुषम्) रूपको (सृज) उत्पन्न कीजिये ॥९॥
Essence
प्रशंसित बुद्धिमान् राज पुरुषों को चाहिये कि अग्नि समान तेजस्वि और बड़े-२ गुणों से युक्त हों और श्रेष्ठ गुणवाले पृथिवी आदि भूतों के तत्त्व को जानके प्रकाशमान होते हुए निर्मल देखने योग्य स्वरूपयुक्त पदार्थों को उत्पन्न करें ॥९॥
Subject
अब अगले मंत्र में सभापति के गुणों का उपदेश किया है।

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