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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 8

191 Sukta
20 Mantra
1/36/8
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
घ्नन्तो॑ वृ॒त्रम॑तर॒न्रोद॑सी अ॒प उ॒रु क्षया॑य चक्रिरे । भुव॒त्कण्वे॒ वृषा॑ द्यु॒म्न्याहु॑तः॒ क्रन्द॒दश्वो॒ गवि॑ष्टिषु ॥

घ्नन्तः॑ । वृ॒त्रम् । अ॒त॒र॒न् । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पः । उ॒रु । क्षया॑य । च॒क्रि॒रे॒ । भुव॑त् । कण्वे॑ । वृषा॑ । द्यु॒म्नी । आऽहु॑तः । क्रन्द॑त् । अश्वः॑ । गोऽइ॑ष्टिषु ॥

Mantra without Swara
घ्नन्तो वृत्रमतरन्रोदसी अप उरु क्षयाय चक्रिरे । भुवत्कण्वे वृषा द्युम्न्याहुतः क्रन्ददश्वो गविष्टिषु ॥

घ्नन्तः । वृत्रम् । अतरन् । रोदसी इति । अपः । उरु । क्षयाय । चक्रिरे । भुवत् । कण्वे । वृषा । द्युम्नी । आहुतः । क्रन्दत् । अश्वः । गोइष्टिषु॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
राजपुरुष जैसे बिजुली सूर्य्य और उसके किरण (वृत्रम्) मेघ का छेदन करते और वर्षावते हुए आकाश और पृथिवी को जल से पूर्ण तथा इन कर्मों को प्राणियों के संसार में अधिक निवास के लिये करते हैं वैसे ही शत्रुओं को (घ्नन्तः) मारते हुए (रोदसी) प्रकाश और अंधेरे में (अपः) कर्मको करें और सब जीवों को (अतरन्) दुःखों के पार करें तथा (गविष्टिषु) गाय आदि पशुओं के संघातों में (क्रन्दत्) शब्द करते हुए (अश्वः) घोड़े के समान (आहुतः) राज्याधिकार में नियत किया (वृषा) सुख की वृष्टि करनेवाला (उरुक्षयाय) बहुत निवास के लिये (कण्वे) बुद्धिमान् में (द्युम्नी) बहुत ऐश्वर्य को धरता हुआ सुखी (भुवत्) होवे ॥८॥
Essence
जैसे बिजुली, भौतिक और सूर्य यही तीन प्रकार के अग्नि मेघ को छिन्न-भिन्न कर सब लोकों को जल से पूर्ण करते हैं उनका युद्ध कर्म सब प्राणियों के अधिक निवास के लिये होता है वैसे ही सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि कण्टकरूप शत्रुओं को मारके प्रजा को निरन्तर तृप्त करें ॥८॥
Subject
फिर भी पूर्वोक्त विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।