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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 6

191 Sukta
20 Mantra
1/36/6
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त्वे इद॑ग्ने सु॒भगे॑ यविष्ठ्य॒ विश्व॒माहू॑यते ह॒विः । स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒ताप॒रं यक्षि॑ दे॒वान्त्सु॒वीर्या॑ ॥

त्वे । इत् । अ॒ग्ने॒ । सु॒भगे॑ । य॒वि॒ष्ठ्य॒ । विश्व॑म् । आ । हू॒य॒ते॒ । ह॒विः । सः । त्वम् । नः॒ । अ॒द्य । सु॒ऽमनाः॑ । उ॒त । अ॒प॒रम् । यक्षि॑ । दे॒वान् । सु॒ऽवीर्या॑ ॥

Mantra without Swara
त्वे इदग्ने सुभगे यविष्ठ्य विश्वमाहूयते हविः । स त्वं नो अद्य सुमना उतापरं यक्षि देवान्त्सुवीर्या ॥

त्वे । इत् । अग्ने । सुभगे । यविष्ठ्य । विश्वम् । आ । हूयते । हविः । सः । त्वम् । नः । अद्य । सुमनाः । उत । अपरम् । यक्षि । देवान् । सुवीर्या॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे (यविष्ठ्य) पदार्थों के मेल करने में बलवान् (अग्ने) सुख देनेवाले राजन् ! जैसे होता (अग्नौ) अग्नि में (विश्वम्) सब (हविः) उत्तमता से संस्कार किया हुआ पदार्थ (आहूयते) डालाजाता है वैसे जिस (सुभगे) उत्तम ऐश्वर्य युक्त (त्वे) आपमें न्याय करने का काम स्थापित करते हैं सो (सुमनाः) अच्छे मनवाले (त्वम्) आप (अद्य) आज (उत) और (अपरम्) दूसरे दिन में भी (नः) हम लोगों को (सुवीर्या) उत्तम वीर्यवाले (देवान्) विद्वान् (इत्) हो (यक्षि) कीजिये ॥६॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् लोग वन्हि में पवित्र होम करके योग्य घृतादि पदार्थों को होम के संसार के लिये सुख उत्पन्न करते हैं वैसे ही दुष्टों को बन्दीघर में डाल के सज्जनों को आनन्द सदा दिया करें ॥६॥ राजपुरुष। सं०
Subject
अब अग्नि के दृष्टान्त में राजपुरुषों के गुणों का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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