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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 5

191 Sukta
20 Mantra
1/36/5
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
म॒न्द्रो होता॑ गृ॒हप॑ति॒रग्ने॑ दू॒तो वि॒शाम॑सि । त्वे विश्वा॒ संग॑तानि व्र॒ता ध्रु॒वा यानि॑ दे॒वा अकृ॑ण्वत ॥

म॒न्द्रः । होता॑ । गृ॒हऽप॑तिः । अग्ने॑ । दू॒तः । वि॒शाम् । अ॒सि॒ । त्वे इति॑ । विश्वा॑ । सम्ऽग॑तानि । व्र॒ता । ध्रु॒वा । यानि॑ । दे॒वाः । अकृ॑ण्वत ॥

Mantra without Swara
मन्द्रो होता गृहपतिरग्ने दूतो विशामसि । त्वे विश्वा संगतानि व्रता ध्रुवा यानि देवा अकृण्वत ॥

मन्द्रः । होता । गृहपतिः । अग्ने । दूतः । विशाम् । असि । त्वे इति । विश्वा । सम्गतानि । व्रता । ध्रुवा । यानि । देवाः । अकृण्वत॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) शरीर और आत्मा के बल से सुशोभित जिससे आप (मन्द्रः) पदार्थों की प्राप्ति करने से सुख का हेतु (होता) सुखों के देने (गृहपतिः) गृहकार्यों का पालन (दूतः) दुष्ट शत्रुओं को तप्त और छेदन करनेवाले (विशाम्) प्रजाओं के (पतिः) रक्षक (असि) हैं इससे सब प्रजा (यानि) जिन (विश्वा) सब (ध्रुवा) निश्चल (संगतानि) सम्यक् युक्त समयानुकूल प्राप्त हुए (व्रता) धर्मयुक्त कर्मों को (देवाः) धार्मिक विद्वान् लोग (अकृण्वत) करते हैं उनका सेवन (त्वे) आपके रक्षक होने से सदा कर सकती हैं ॥५॥
Essence
जो प्रशस्त राजा, दूत और सभासद् होते हैं वे ही राज्य को पालन कर सकते हैं इनसे विपरीत मनुष्य नहीं कर सकते ॥५॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।