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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 3

191 Sukta
20 Mantra
1/36/3
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृत्पथ्याबृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्र त्वा॑ दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम् । म॒हस्ते॑ स॒तो वि च॑रन्त्य॒र्चयो॑ दि॒वि स्पृ॑शन्ति भा॒नवः॑ ॥

प्र । त्वा॒ । दू॒तम् । वृ॒णी॒म॒हे॒ । होता॑रम् । वि॒श्वऽवे॑दसम् । म॒हः । ते॒ । स॒तः । वि । च॒र॒न्ति॒ । अ॒र्चयः॑ । दि॒वि । स्पृ॒श॒न्ति॒ । भा॒नवः॑ ॥

Mantra without Swara
प्र त्वा दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । महस्ते सतो वि चरन्त्यर्चयो दिवि स्पृशन्ति भानवः ॥

प्र । त्वा । दूतम् । वृणीमहे । होतारम् । विश्ववेदसम् । महः । ते । सतः । वि । चरन्ति । अर्चयः । दिवि । स्पृशन्ति । भानवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् राजदूत ! जैसे हम लोग (विश्ववेदसम्) सब शिल्पविद्या का हेतु (होतारम्) ग्रहण करने और (दूतम्) सब पदार्थों को तपानेवाले अग्नि को (वृणीमहे) स्वीकार करते हैं वैसे (त्वा) तुझको भी ग्रहण करते हैं तथा जैसे (महः) महागुणविशिष्ट (सतः) सत्कारणरूप से नित्य अग्नि के (भानवः) किरण सब पदार्थों से (स्पृशन्ति) संबन्ध करते और (अर्चयः) प्रकाशरूप ज्वाला (दिवि) द्योतनात्मक सूर्य्य के प्रकाश में (विचरन्ति) विशेष करके प्राप्त होती है वैसे तेरे भी सब काम होने चाहिये ॥३॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अपने काम में प्रवीण राजदूत जैसे सब मनुष्य महाप्रकाशादिगुणयुक्त अग्नि को पदार्थों की प्राप्ति वा अप्राप्ति के कारण दूत के समान जान और शिल्पकार्यों को सिद्ध करके सुखों को स्वीकार करते और जैसे इस बिजुली रूप अग्नि की दीप्ति सब जगह वर्त्तती हैं और प्रसिद्ध अग्नि की दीप्ति छोटी होने तथा वायु के छेदक होने से अवकाश करनेवाली होकर ज्वाला ऊपर जाती है वैसे तूं भी अपने कामों में प्रवृत्त हो ॥३॥
Subject
अब अगले मन्त्र में भौतिक अग्नि के दृष्टान्त से राजदूत के गुणों का उपदेश किया है।