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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 20

191 Sukta
20 Mantra
1/36/20
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- सतःपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वे॒षासो॑ अ॒ग्नेरम॑वन्तो अ॒र्चयो॑ भी॒मासो॒ न प्रती॑तये । र॒क्ष॒स्विनः॒ सद॒मिद्या॑तु॒माव॑तो॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह ॥

त्वे॒षासः॑ । अ॒ग्नेः । अम॑ऽवन्तः । अ॒र्चयः॑ । भी॒मासः॑ । न । प्रति॑ऽइतये । र॒क्ष॒स्विनः॑ । सद॑म् । इत् । या॒तु॒ऽमाव॑तः । विश्व॑म् । सम् । अ॒त्रिण॑म् । द॒ह॒ ॥

Mantra without Swara
त्वेषासो अग्नेरमवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये । रक्षस्विनः सदमिद्यातुमावतो विश्वं समत्रिणं दह ॥

त्वेषासः । अग्नेः । अमवन्तः । अर्चयः । भीमासः । न । प्रतिइतये । रक्षस्विनः । सदम् । इत् । यातुमावतः । विश्वम् । सम् । अत्रिणम् । दह॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे तेजस्वी सभास्वामिन् ! आप (अग्नेः) सूर्य विद्युत और प्रसिद्ध रूप अग्नि की (त्वेषासः) प्रकाशस्वरूप (भीमासः) भयकारक (अर्चयः) ज्वाला। के (न) समान जो (अमवन्तः) निन्दित रोग करनेवाले (रक्षस्विनः) राक्षस अर्थात् निंदित पुरुष हैं उन और (अत्रिणम्) बल से दूसरे के पदार्थों को हरनेवाले शत्रु को (इत्) ही (संदह) अच्छे प्रकार भस्म कीजिये और (प्रतीतये) विज्ञान वा उत्तम सुख की प्रतीति होने के लिये (विश्वम्) सब (सदम्) संसार तथा (यातुमावतः) मेरे समान होने वालों की रक्षा कीजिये ॥२०॥
Essence
इस मंत्र में सायणाचार्य ने यातु पूर्वपद और भावान् उत्तर पद नहीं जान (यातुमा) इस पूर्वपद से मतुप् प्रत्यय माना है सो पद पाठ से विरुद्ध होने के कारण अशुद्ध है। सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों और प्रजा के मनुष्यों को चाहिये कि जिस प्रकार अग्नि आदि पदार्थ वन आदि को भस्म कर देते हैं वैसे दुःख देनेवाले शत्रु जनों के विनाश के लिये इस प्रकार प्रयत्न करें ॥२०॥ इस सूक्त में सबकी रक्षा करनेवाले परमेश्वर तथा दूत के दृष्टान्त से भौतिक अग्नि के गुणों का वर्णन दूत के गुणों का उपदेश अग्नि के दृष्टान्त से राजपुरुषों के गुणों का वर्णन सभापति का कृत्य सभापति होने के अधिकारी का कथन अग्नि आदि पदार्थों से उपयोग लेने की रीति मनुष्यों को सभापति से प्रार्थना सब मनुष्यों को सभाध्यक्ष के साथ मिलके दुष्टों का मारना और राजपुरुषों के सहायक जगदीश्वर के उपदेश से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह छत्तीसवां सूक्त और ग्यारहवां वर्ग समाप्त हुआ ॥३६॥
Subject
अब उस सभापति के प्रति क्या-२ उपदेश करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।