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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 2

191 Sukta
20 Mantra
1/36/2
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृत्सतः पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
जना॑सो अ॒ग्निं द॑धिरे सहो॒वृधं॑ ह॒विष्म॑न्तो विधेम ते । स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ इ॒हावि॒ता भवा॒ वाजे॑षु सन्त्य ॥

जना॑सः । अ॒ग्निम् । द॒धि॒रे॒ । स॒हः॒ऽवृध॑म् । ह॒विष्म॑न्तः । वि॒धे॒म॒ । ते॒ । सः । त्वम् । नः॒ । अ॒द्य । सु॒ऽमनाः॑ । इ॒ह । अ॒वि॒ता । भव॑ । वाजे॑षु । स॒न्त्य॒ ॥

Mantra without Swara
जनासो अग्निं दधिरे सहोवृधं हविष्मन्तो विधेम ते । स त्वं नो अद्य सुमना इहाविता भवा वाजेषु सन्त्य ॥

जनासः । अग्निम् । दधिरे । सहःवृधम् । हविष्मन्तः । विधेम । ते । सः । त्वम् । नः । अद्य । सुमनाः । इह । अविता । भव । वाजेषु । सन्त्य॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (सन्त्य) सब वस्तु देनेहारे ईश्वर ! जैसे (हविष्मन्तः) उत्तम देने लेने योग्य वस्तुवाले (जनासः) विद्या में प्रसिद्ध हुए विद्वान् लोग जिस (ते) आपके आश्रय का (दधिरे) धारण करते हैं वैसे उन (सहोवृधम्) बल को बढ़ानेवाले (अग्निम्) सबके रक्षक आपको हम लोग (विधेम) सेवन करें (सः) सो (सुमनाः) उत्तम ज्ञानवाले (त्वम्) आप (अद्य) आज (नः) हम लोगों के (इह) इस संसार और (वाजेषु) युद्धो में (अविता) रक्षक और सब विद्याओं में प्रवेश करानेवाले (भव) हूजिये ॥२॥
Essence
मनुष्यों को एक अद्वितीय परमेश्वर की उपासना ही से संतुष्ट रहना चाहिये क्योंकि विद्वान् लोग परमेश्वर के स्थान में अन्य वस्तु को उपासना भाव से स्वीकार कभी नहीं करते इसी कारण उनका युद्ध वा इस संसार में कभी पराजय दीख नहीं पड़ता क्योंकि वे धार्मिक ही होते हैं और इसीसे ईश्वर की उपासना नहीं करनेवाले उनके जीतने को समर्थ नहीं होते, क्योंकि ईश्वर जिनकी रक्षा करनेवाला है उनका कैसे पराजय हो सकता है ॥२॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में उक्त विषय का उपदेश किया है।