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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 17

191 Sukta
20 Mantra
1/36/17
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- विराडुपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्व॑व्ने सु॒वीर्य॑म॒ग्निः कण्वा॑य॒ सौभ॑गम् । अ॒ग्निः प्राव॑न्मि॒त्रोत मेध्या॑तिथिम॒ग्निः सा॒ता उ॑पस्तु॒तम् ॥

अ॒ग्निः । व॒व्ने॒ । सु॒ऽवीर्य॑म् । अ॒ग्निः । कण्वा॑य । सौभ॑गम् । अ॒ग्निः । प्र । आ॒व॒त् । मि॒त्रा । उ॒त । मेध्य॑ऽअतिथिम् । अ॒ग्निः । सा॒तौ । उ॒प॒ऽस्तु॒तम् ॥

Mantra without Swara
अग्निर्वव्ने सुवीर्यमग्निः कण्वाय सौभगम् । अग्निः प्रावन्मित्रोत मेध्यातिथिमग्निः साता उपस्तुतम् ॥

अग्निः । वव्ने । सुवीर्यम् । अग्निः । कण्वाय । सौभगम् । अग्निः । प्र । आवत् । मित्रा । उत । मेध्यअतिथिम् । अग्निः । सातौ । उपस्तुतम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो विद्वान् (अग्निः) भौतिक अग्नि के समान (सातौ) युद्ध में (उपस्तुतम्) उपगत स्तुति के योग्य (सुवीर्य्यम्) अच्छे प्रकार शरीर और आत्मा के बल पराक्रम (अग्निः) विद्युत् के सदृश (कण्वाय) उसी बुद्धिमान् के लिये (सौभगम्) अच्छे ऐश्वर्य्य को (वव्ने) किसी ने याचित किया हुआ देता है (अग्निः) पावक के तुल्य (मित्रा) मित्रों को (आवत्) पालन करता (उत) और (अग्निः) जाठराग्निवत् (उपस्तुतम्) शुभ गुणों से स्तुति करने योग्य (मेध्यातिथिम्) कारीगर विद्वान् को सेवे वही पुरुष राजा होने को योग्य होता है ॥१७॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह भौतिक अग्नि विद्वानों का ग्रहण किया हुआ उनके लिये बल पराक्रम और सौभाग्य को देकर शिल्पविद्या में प्रवीण और उसके मित्रों की सदा रक्षा करता है वैसे ही प्रजा और सेना के भद्रपुरुषों से प्रार्थना किया हुआ यह सभाध्यक्ष राजा उनके लिये बल पराक्रम उत्साह और ऐश्वर्य्य का सामर्थ्य देकर युद्ध विद्या में प्रवीण और उनके मित्रों को सब प्रकार पाले ॥१७॥
Subject
फिर भी इन सभाध्यक्षादि राजपुरुषों के गुण अग्नि के दृष्टान्त से अगले मंत्र में कहे हैं।