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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 16

191 Sukta
20 Mantra
1/36/16
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
घ॒नेव॒ विष्व॒ग्वि ज॒ह्यरा॑व्ण॒स्तपु॑र्जम्भ॒ यो अ॑स्म॒ध्रुक् । यो मर्त्यः॒ शिशी॑ते॒ अत्य॒क्तुभि॒र्मा नः॒ स रि॒पुरी॑शत ॥

घ॒नाऽइ॑व । विष्व॑क् । वि । ज॒हि॒ । अरा॑व्णः । तपुः॑ऽजम्भ । यः । अ॒स्म॒ऽध्रुक् । यः । मर्त्यः॑ । शिशी॑ते । अति॑ । अ॒क्तुऽभिः॑ । मा । नः॒ । सः । रि॒पुः । ई॒श॒त॒ ॥

Mantra without Swara
घनेव विष्वग्वि जह्यराव्णस्तपुर्जम्भ यो अस्मध्रुक् । यो मर्त्यः शिशीते अत्यक्तुभिर्मा नः स रिपुरीशत ॥

घनाइव । विष्वक् । वि । जहि । अराव्णः । तपुःजम्भ । यः । अस्मध्रुक् । यः । मर्त्यः । शिशीते । अति । अक्तुभिः । मा । नः । सः । रिपुः । ईशत॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 1

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Meaning
हे (तपुर्ज्जम्भ) शत्रुओं को सताने और नाश करने के शस्त्र बांधनेवाले सेनापते ! (विष्वक्) सर्वथा सेनादिबलों से युक्त होके आप (अराव्णः) सुखदानरहित शत्रुओं को (घनेव) घन के समान (विजहि) विशेष करके जीत और (यः) जो (मर्त्यः) मनुष्य (अक्तुभिः) रात्रियों से (अस्मद्ध्रुक्) हमारा द्रोही (अतिशिशीते) अति हिंसा करता हो (सः) सो (रिपुः) वैरी (नः) हम लोगों को पीड़ा देने में (मा) मत (ईशत) समर्थ होवें ॥१६॥
Essence
इस मंत्र में उपमा अलंकार है। सेनाध्यक्षादि लोग जैसे लोहा के घन से लोहे और पाषाणादिकों को तोड़ते हैं वैसे ही अधर्म्मी दुष्टशत्रुओं के अङ्गों को छिन्न-भिन्न कर दिन रात धर्म्मात्मा प्रजाजनों के पालन में तत्पर हों जिससे शत्रुजन इन प्रजाओं को दुःख देने को समर्थ न हो सकें ॥१६॥
Subject
फिर भी अगले मंत्र में उसी सभाध्यक्ष का उपदेश किया है।

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