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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 14

191 Sukta
20 Mantra
1/36/14
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृद्विष्टारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वो नः॑ पा॒ह्यंह॑सो॒ नि के॒तुना॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह । कृ॒धी न॑ ऊ॒र्ध्वाञ्च॒रथा॑य जी॒वसे॑ वि॒दा दे॒वेषु॑ नो॒ दुवः॑ ॥

ऊ॒र्ध्वः । नः॒ । पा॒हि॒ । अंह॑सः । नि । के॒तुना॑ । विश्व॑म् । सम् । इ॒त्रिण॑म् । द॒ह॒ । कृ॒धि । नः॒ । ऊ॒र्ध्वान् । च॒रथा॑य । जी॒वसे॑ । वि॒दाः । दे॒वेषु॑ । नः॒ । दुवः॑ ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह । कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः ॥

ऊर्ध्वः । नः । पाहि । अंहसः । नि । केतुना । विश्वम् । सम् । इत्रिणम् । दह । कृधि । नः । ऊर्ध्वान् । चरथाय । जीवसे । विदाः । देवेषु । नः । दुवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे सभापते ! आप (केतुना) बुद्धि के दान से (नः) हम लोगों को (अंहसः) दूसरे का पदार्थ हरण रूप पाप से (निपाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये (विश्वम्) सब (अत्रिणम्) अन्याय से दूसरे के पदार्थों को खानेवाले शत्रुमात्र को (संदह) अच्छे प्रकार जलाइये और (ऊर्ध्वः) सबसे उत्कृष्ट आप (चरथाय) ज्ञान और सुख की प्राप्ति के लिये (नः) हम लोगों को (ऊर्ध्वान्) बड़े-२ गुण कर्म और स्वभाववाले (कृधि) कीजिये तथा (नः) हमको (देवेषु) धार्मिक विद्वानों में (जीवसे) संपूर्ण अवस्था होने के लिये (दुवः) सेवा को (विदाः) प्राप्त कीजिये ॥१४॥
Essence
अच्छे गुण कर्म और स्वभाववाले सभाध्यक्ष राजा को चाहिये कि राज्य की रक्षा नीति और दण्ड के भय से सब मनुष्यों कोपाप से हटा सब शत्रुओं को मार और विद्वानों की सब प्रकार सेवा करके प्रजा में ज्ञान सुख और अवस्था बढ़ाने के लिये सब प्राणियों को शुभगुणयुक्त सदा किया करे ॥१४॥
Subject
फिर वह सभापति कैसा होवे, यह अगले मंत्र में कहा है।