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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 13

191 Sukta
20 Mantra
1/36/13
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- उपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्व ऊ॒ षु ण॑ ऊ॒तये॒ तिष्ठा॑ दे॒वो न स॑वि॒ता । ऊ॒र्ध्वो वाज॑स्य॒ सनि॑ता॒ यद॒ञ्जिभि॑र्वा॒घद्भि॑र्वि॒ह्वया॑महे ॥

ऊ॒र्ध्वः । ऊँ॒ इति॑ । सु । नः॒ । ऊ॒तये॑ । तिष्ठ॑ । दे॒वः । न । स॒वि॒ता । ऊ॒र्ध्वः । वाज॑स्य । सनि॑ता । यत् । अ॒ञ्जिऽभिः॑ । वा॒घत्ऽभिः॑ । वि॒ऽह्वया॑महे ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे ॥

ऊर्ध्वः । ऊँ इति । सु । नः । ऊतये । तिष्ठ । देवः । न । सविता । ऊर्ध्वः । वाजस्य । सनिता । यत् । अञ्जिभिः । वाघत्भिः । विह्वयामहे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभापते ! आप (देवः) सबको प्रकाशित करने हारे (सविता) सूर्य लोक के (न) समान (नः) हम लोगों की रक्षा आदि के लिये (ऊर्ध्वः) ऊंचे आसन पर (सुतिष्ठ) सुशोभित हूजिये (उ) और (ऊर्ध्वः) उन्नति को प्राप्त हुए (वाजस्य) युद्ध के (सविता) सेवनेवाले हूजिये इस लिये हम लोग (अञ्जिभिः) यज्ञ के साधनों को प्रसिद्ध करने तथा (वाद्यद्भिः) सब ऋतुओं में यज्ञ करनेवाले विद्वानों के साथ (विह्वयामहे) विविधप्रकार के शब्दों से आपकी स्तुति करते हैं ॥१३॥
Essence
सूर्य्य के समान अतितेजस्वी सभापति को चाहिये कि संग्राम सेवन से दुष्ट शत्रुओं को हटा के सब प्राणियों की रक्षा के लिये प्रसिद्ध विद्वानों के साथ सभा के बीच में ऊंचे आसन पर बैठे ॥१३॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।