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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 12

191 Sukta
20 Mantra
1/36/12
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
रा॒यस्पू॑र्धि स्वधा॒वोऽस्ति॒ हि तेऽग्ने॑ दे॒वेष्वाप्य॑म् । त्वं वाज॑स्य॒ श्रुत्य॑स्य राजसि॒ स नो॑ मृळ म॒हाँ अ॑सि ॥

रा॒यः । पू॒र्धि॒ । स्वध॒ा॒ऽवः॒ । अ॒स्ति॒ । हि । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । दे॒वेषु॑ । आप्य॑म् । त्वम् । वाज॑स्य । श्रुत्य॑स्य । रा॒ज॒सि॒ । सः । नः॑ । मृ॒ळ्ह॒ । म॒हान् । अ॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
रायस्पूर्धि स्वधावोऽस्ति हि तेऽग्ने देवेष्वाप्यम् । त्वं वाजस्य श्रुत्यस्य राजसि स नो मृळ महाँ असि ॥

रायः । पूर्धि । स्वधावः । अस्ति । हि । ते । अग्ने । देवेषु । आप्यम् । त्वम् । वाजस्य । श्रुत्यस्य । राजसि । सः । नः । मृळ्ह । महान् । असि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वधावः) भोगने योग्य अन्नादि पदार्थों से युक्त (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी सभाध्यक्ष ! (हि) जिसकारण (ते) आपकी (देवेषु) विद्वानों के बीच में (आप्यम्) ग्रहण करने योग्य मित्रता (अस्ति) है इसलिये आप (रायः) विद्या, सुवर्ण और चक्रवर्त्ति राज्यादि धनों को (पूर्धि) पूर्ण कीजिये जो आप (महान्) बड़े-२ गुणों से युक्त (असि) हैं और (श्रुत्यस्य) सुनने के योग्य (वाजस्य) युद्ध के बीच में प्रकाशित होते हैं (सः) सो (त्वम्) पुत्र के तुल्य प्रजा की रक्षा करने हारे आप (नः) हम लोगों को (मृड) सुखयुक्त कीजिये ॥१२॥
Essence
वेदों को जाननेवाले उत्तम विद्वानों में मित्रता रखते हुए सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को उचित है कि अन्नधन आदि पदार्थों के कोशों की निरन्तर भर और प्रसिद्ध डाकुओं के साथ निरन्तर युद्ध करने को समर्थ होके प्रजा के लिये बड़े-२ सुख देनेवाले होवें ॥१२॥
Subject
फिर भी अगले मंत्र में उन्हीं राजपुरुषों के गुणों का उपदेश किया है।