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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 11

191 Sukta
20 Mantra
1/36/11
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृत्पथ्याबृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यम॒ग्निं मेध्या॑तिथिः॒ कण्व॑ ई॒ध ऋ॒तादधि॑ । तस्य॒ प्रेषो॑ दीदियु॒स्तमि॒मा ऋच॒स्तम॒ग्निं व॑र्धयामसि ॥

यम् । अ॒ग्निम् । मेध्य॑ऽअतिथिः । कण्वः॑ । ई॒घे । ऋ॒तात् । अधि॑ । तस्य॑ । प्र । इषः॑ । दी॒दि॒युः॒ । तम् । इ॒माः । ऋचः॑ । तम् । अ॒ग्निम् । व॒र्ध॒या॒म॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
यमग्निं मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि । तस्य प्रेषो दीदियुस्तमिमा ऋचस्तमग्निं वर्धयामसि ॥

यम् । अग्निम् । मेध्यअतिथिः । कण्वः । ईघे । ऋतात् । अधि । तस्य । प्र । इषः । दीदियुः । तम् । इमाः । ऋचः । तम् । अग्निम् । वर्धयामसि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
(मेध्यातिथिः) पवित्र सेवक शिष्यवर्गों से युक्त (कण्वः) विद्यासिद्ध कर्मकाण्ड में कुशल विद्वान् (ऋतादधि) मेघमण्डल के ऊपर से सामर्थ्य होने के लिये (यम्) जिस (अग्निम्) दाहयुक्त सब पदार्थों के काटनेवाले अग्नि को (ईधे) प्रदीप्त करता है (तस्य) उस अग्नि के (इषः) घृतादि पदार्थों को मेघमण्डल में प्राप्त करनेवाले किरण (प्र) अत्यन्त (दीदियुः) प्रज्वलित होते हैं और (इमाः) ये (ऋचः) वेद के मंत्र जिस अग्नि के गुणों का प्रकाश करते हैं (तम्) उसी (अग्निम्) अग्नि को सभाध्यक्षादि राजपुरुष हम लोग शिल्प क्रियासिद्धि के लिये (वर्धयामसि) बढ़ाते हैं ॥११॥
Essence
सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि होता आदि विद्वान् लोग वायु वृष्टि के शोधक हवन के लिये जिस अग्नि को प्रकाशित करते हैं जिसके किरण ऊपर को प्रकाशित होते और जिसके गुणों को वेदमंत्र कहते हैं उसी अग्नि को राज्य साधक क्रियासिद्धि के लिये बढ़ावें ॥११॥
Subject
फिर सभाध्यक्षादि लोग अग्नि आदि पदार्थों से कैसे उपकार लेवें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।