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Rigveda Mandal 1 / Sukta 36 / Mantra 10

191 Sukta
20 Mantra
1/36/10
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhanda- निचृद्विष्टारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यं त्वा॑ दे॒वासो॒ मन॑वे द॒धुरि॒ह यजि॑ष्ठं हव्यवाहन । यं कण्वो॒ मेध्या॑तिथिर्धन॒स्पृतं॒ यं वृषा॒ यमु॑पस्तु॒तः ॥

यम् । त्वा॒ । दे॒वासः॑ । मन॑वे । द॒धुः । इ॒ह । यजि॑ष्ठम् । ह॒व्य॒ऽवा॒ह॒न॒ । यम् । कण्वः॑ । मेध्य॑ऽअतिथिः । ध॒न॒ऽस्पृत॑म् । यम् । वृषा॑ । यम् । उ॒प॒ऽस्तु॒तः ॥

Mantra without Swara
यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन । यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः ॥

यम् । त्वा । देवासः । मनवे । दधुः । इह । यजिष्ठम् । हव्यवाहन । यम् । कण्वः । मेध्यअतिथिः । धनस्पृतम् । यम् । वृषा । यम् । उपस्तुतः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हव्यवाहन) ग्रहण करने योग्य वस्तुओं की प्राप्ति करानेवाले सभ्यजन ! (यम्) जिस विचारशील (यजिष्ठम्) अत्यन्त यज्ञ करनेवाले (त्वा) आप को (देवासः) विद्वान् लोग (मनवे) विचारने योग्य राज्य की शिक्षा के लिये (इह) इस पृथिवी में (दधुः) धारण करते (यम्) जिस शिक्षा पाये हुए (धनस्पृतम्) विद्या सुवर्ण आदि धन से युक्त आप को (मेध्यातिथिः) पवित्र अतिथियों से युक्त अध्यापक (कण्वः) विद्वान् पुरुष स्वीकार करता (यम्) जिस सुख की वृष्टि करनेवाले (त्वा) आप को (वृषा) सुखों का फैलानेवाला धारण करता और (यम्) जिस स्तुति के योग्य आप को (उपस्तुतः) समीपस्थ सज्जनों की स्तुति करनेवाला राजपुरुष धारण करता है उन आप को हम लोग सभापति के अधिकार में नियत करते हैं ॥१०॥
Essence
इस सृष्टि में सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् और अन्य सबको चतुर पुरुष मिल के जिस विचारशील ग्रहण के योग्य वस्तुओं के प्राप्त करानेवाले शुभ गुणों से भूषित विद्या सुवर्णादिधनयुक्त सभा के योग्य पुरुष को राज्य शिक्षा के लिये नियुक्त करें उसी पिता के तुल्य पालन करनेवाला जन राजा होवे ॥१०॥
Subject
मनुष्य किस प्रकार के पुरुष को सभाध्यक्ष करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।