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Rigveda Mandal 1 / Sukta 35 / Mantra 9

191 Sukta
11 Mantra
1/35/9
Devata- सविता Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यपाणिः सवि॒ता विच॑र्षणिरु॒भे द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरी॑यते । अपामी॑वां॒ बाध॑ते॒ वेति॒ सूर्य॑म॒भि कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ द्यामृ॑णोति ॥

हिर॑ण्यऽपाणिः । स॒वि॒ता । विऽच॑र्षणिः । उ॒भे इति॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । अ॒न्तः । ई॒य॒ते॒ । अप॑ । अमी॑वाम् । बाध॑ते । वेति॑ । सूर्य॑म् । अ॒भि । कृ॒ष्णेन॑ । रज॑सा । द्याम् । ऋ॒णो॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
हिरण्यपाणिः सविता विचर्षणिरुभे द्यावापृथिवी अन्तरीयते । अपामीवां बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति ॥

हिरण्यपाणिः । सविता । विचर्षणिः । उभे इति । द्यावापृथिवी इति । अन्तः । ईयते । अप । अमीवाम् । बाधते । वेति । सूर्यम् । अभि । कृष्णेन । रजसा । द्याम् । ऋणोति॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 3

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Meaning
हे सभाध्यक्ष ! जैसे (हिरण्यपाणिः) जिसके हिरण्यरूप ज्योति हाथों के समान ग्रहण करनेवाले हैं (विचर्षणिः) पदार्थों को छिन्न-भिन्न और (सविता) रसों को उत्पन्न करनेवाला सूर्यलोक (उभे) दोनों (द्यावापृथिवी) प्रकाश भूमि को (अन्तः) अन्तरिक्ष के मध्य में (ईयते) प्राप्त (अमीवाम्) रोग पीड़ा का (अपबाधते) निवारण (सूर्य्य) सबको प्राप्त होनेवाले अपने किरणसमूह को (अभिवेति) साक्षात् प्रगट और (कृष्णेन) पृथिवी आदि प्रकाश रहित (रजसा) लोकसमूह के साथ अपने (द्याम्) प्रकाश को (ऋणोति) प्राप्त करता है वैसे तुझको भी होना चाहिये ॥९॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सभापते जैसे यह सूर्य्यलोक बहुत लोकों के साथ आकर्षण संबन्ध से वर्त्तमान सब वस्तुमात्र को प्रकाशित करता हुआ प्रकाश तथा पृथिवी लोक का मेल करता है वैसे स्वभावयुक्त आप हूजिये ॥९॥
Subject
फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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