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Rigveda Mandal 1 / Sukta 35 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/35/7
Devata- सविता Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि सु॑प॒र्णो अ॒न्तरि॑क्षाण्यख्यद्गभी॒रवे॑पा॒ असु॑रः सुनी॒थः । क्वे॒३॒॑दानीं॒ सूर्यः॒ कश्चि॑केत कत॒मां द्यां र॒श्मिर॒स्या त॑तान ॥

वि । सु॒ऽप॒र्णः । अ॒न्तरि॑क्षाणि । अ॒ख्य॒त् । ग॒भी॒रऽवे॑पाः । असु॒रः । सु॒ऽनी॒थः । क्व॑ । इ॒दानी॒म् । सूर्यः॑ । कः । चि॒के॒त॒ । क॒त॒माम् । द्याम् । र॒श्मिः । अ॒स्य॒ । आ । त॒ता॒न॒ ॥

Mantra without Swara
वि सुपर्णो अन्तरिक्षाण्यख्यद्गभीरवेपा असुरः सुनीथः । क्वे३दानीं सूर्यः कश्चिकेत कतमां द्यां रश्मिरस्या ततान ॥

वि । सुपर्णः । अन्तरिक्षाणि । अख्यत् । गभीरवेपाः । असुरः । सुनीथः । क्व । इदानीम् । सूर्यः । कः । चिकेत । कतमाम् । द्याम् । रश्मिः । अस्य । आ । ततान॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 1

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Meaning
हे विद्वज्जन ! जैसे यह सूर्य्यलोक जो (असुरः) सबके लिये प्राणदाता अर्थात् रात्रि में सोये हुओं को उदय के समय चेतनता देने (गभीरवेपाः) जिसका कंपन गभीर अर्थात् सूक्ष्म होने से साधारण पुरुषों के मन में नहीं बैठता (सुनीथः) उत्तम प्रकार से पदार्थों की प्राप्ति कराने और (सुपर्णः) उत्तम पतन स्वभाव किरण युक्त सूर्य्य (अन्तरिक्षाणि) अन्तरिक्ष में ठहरे हुए सब लोकों को (व्यख्यत्) प्रकाशित करता है (इदानीम्) इस वर्त्तमान समय रात्रि में (क्व) कहाँ है। इस बात को (कः) कौन (चिकेत) जानता तथा (कतमाम्) बहुतों में किस (द्याम्) प्रकाश को (अस्य) इस सूर्य्य के (रश्मिः) किरण (आततान) व्याप्त हो रहे हैं इस बात को भी कौन जानता है अर्थात् कोई-२ जो विद्वान् हैं वे ही जानते हैं सब साधारण पुरुष नहीं इस लिये सूर्य्यलोक का स्वरूप और गति आदि को तूं जान ॥७॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है जब यह भूगोल अपने भ्रमण से सूर्य्य के प्रकाश का आच्छादन कर अन्धकार करता है तब साधारण मनुष्य पूंछते है कि अब वह सूर्य कहाँ गया उस प्रश्न का उत्तर से समाधान करे कि पृथिवी के दूसरे पृष्ठ में है जिसका चलना अति सूक्ष्म है वैसे वह मूर्ख मनुष्यों से जाना नहीं जाता वैसे ही महाशय मनुष्यों का आशय भी अविद्वान् लोग नहीं जान सकते ॥७॥
Subject
फिर इस सूर्यलोक के गुणों का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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