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Rigveda Mandal 1 / Sukta 35 / Mantra 6

191 Sukta
11 Mantra
1/35/6
Devata- सविता Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ति॒स्रो द्यावः॑ सवि॒तुर्द्वा उ॒पस्थाँ॒ एका॑ य॒मस्य॒ भुव॑ने विरा॒षाट् । आ॒णिं न रथ्य॑म॒मृताधि॑ तस्थुरि॒ह ब्र॑वीतु॒ य उ॒ तच्चिके॑तत् ॥

ति॒स्रः । द्यावः॑ । स॒वि॒तुः । द्वौ । उ॒पऽस्था॑ । एका॑ । य॒मस्य॑ । भुव॑ने । वि॒रा॒षाट् । आ॒णिम् । न । रथ्य॑म् । अ॒मृता॑ । अधि॑ । त॒स्थुः॒ । इ॒ह । ब्र॒वी॒तु॒ । यः । ऊँ॒ इति॑ । तत् । चिके॑तत् ॥

Mantra without Swara
तिस्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थाँ एका यमस्य भुवने विराषाट् । आणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत् ॥

तिस्रः । द्यावः । सवितुः । द्वौ । उपस्था । एका । यमस्य । भुवने । विराषाट् । आणिम् । न । रथ्यम् । अमृता । अधि । तस्थुः । इह । ब्रवीतु । यः । ऊँ इति । तत् । चिकेतत्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! तूं (रथ्यम्) रथ आदि के चलाने योग्य (आणिम्) संग्राम को जीतनेवाले राज भृत्यों के (न) समान इस (सवितुः) सूर्यलोक के प्रकाश में जो (तिस्रः) तीन अर्थात् (द्यावः) सूर्य अग्नि और विद्युत् रूप के साधनों से युक्त (अधितस्थुः) स्थित होते हैं उनमें से (द्वौ) दो प्रकाश वा भूगोल सूर्य मंडल के (उपस्था) समीप में रहते हैं और (एका) एक (विराषाट्) शूरवीर ज्ञानवान् प्राप्ति स्वभाववाले जीवों को सहनेवाली बिजुली रूप दीप्ति (यमस्य) नियम करनेवाले वायु के (भुवने) अन्तरिक्ष में ही रहती है और जो (अमृता) कारणरूप से नाश रहित चन्द्र तारे आदि लोक हैं वे इस सूर्य लोक के प्रकाश में प्रकाशित होकर (अधितस्थुः) स्थित होते हैं (यः) जो मनुष्य (उ) वादविवाद से इनको (चिकेतत्) जाने और उस ज्ञान को (ब्रवीतु) अच्छे प्रकार उपदेश करे उसीके समान होके हमको सद्गुणों का उपदेश किया कर ॥६॥ टि० पदार्थ में इह शब्द का अर्थ छूट गया है। सं०
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जिस ईश्वर ने अग्निरूप कारण से सूर्य अग्नि और बिजुली रूप तीन प्रकार की दीप्ति रची है जिनके द्वारा सब कार्य सिद्ध होते हैं जब कोई ऐसा पूछे कि जीव अपने शरीरों को छोड़के जिस यम के स्थान को प्राप्त होते हैं वह कौन है तब उत्तर देनेवाला अन्तरिक्ष में रहनेवाले वायु को प्राप्त होते हैं ऐसा कहे जैसे युद्ध में रथ भृत्य आदि सेना के अङ्गों में स्थित होते हैं वैसे मरे और जीते हुए जीव वायु के अवलंब से स्थित होते हैं। पृथिवी चन्द्रमा और नक्षत्रादि लोक सूर्य्य प्रकाश के आश्रय से स्थित होते हैं जो विद्वान् हो वही प्रश्नों के उत्तर कह सकता है, मूर्ख नहीं। इस लिये ।मनुष्यों को मूर्ख अर्थात् अनाप्तों के कहने में विश्वास और विद्वानों के कथन में अश्रद्धा कभी न करनी चाहिये ॥६॥
Subject
फिर भी वायु और सूर्य्य के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।