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Rigveda Mandal 1 / Sukta 35 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/35/4
Devata- सविता Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भीवृ॑तं॒ कृश॑नैर्वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यशम्यं यज॒तो बृ॒हन्त॑म् । आस्था॒द्रथं॑ सवि॒ता चि॒त्रभा॑नुः कृ॒ष्णा रजां॑सि॒ तवि॑षीं॒ दधा॑नः ॥

अ॒भिऽवृ॑तम् । कृश॑नैः । वि॒श्वऽरू॑प॒म् । हिर॑ण्यऽशम्यम् । य॒ज॒तः । बृ॒हन्त॑म् । आ । अ॒स्था॒त् । रथ॑म् । स॒वि॒ता । चि॒त्रऽभा॑नुः । कृ॒ष्णा । रजां॑सि । तवि॑षीम् । दधा॑नः ॥

Mantra without Swara
अभीवृतं कृशनैर्विश्वरूपं हिरण्यशम्यं यजतो बृहन्तम् । आस्थाद्रथं सविता चित्रभानुः कृष्णा रजांसि तविषीं दधानः ॥

अभिवृतम् । कृशनैः । विश्वरूपम् । हिरण्यशम्यम् । यजतः । बृहन्तम् । आ । अस्थात् । रथम् । सविता । चित्रभानुः । कृष्णा । रजांसि । तविषीम् । दधानः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभा के स्वामी राजन् ! आप जैसे (यजतः) संगति करने वा प्रकाश का देनेवाला (चित्रभानुः) चित्र विचित्र दीप्ति युक्त (सविता) सूर्यलोक वा वायु (कृशनैः) तीक्ष्ण करनेवाले किरण वा विविध रूपों से (बृहंतम्) बड़े (हिरण्यशम्यम्) जिसमें सुवर्ण वा ज्योति शांत करने योग्य हो (अभीवृतम्) चारों ओर से वर्त्तमान (विश्वरूपम्) जिसके प्रकाश वा चाल में बहुत रूप हैं उस (रथम्) रमणीय रथ (कृष्णा) आकर्षण वा कृष्णवर्ण युक्त (रजांसि) पृथिव्यादि लोकों और (तविषीम्) बल को (दधानः) धारण करता हुआ (आस्थात्) अच्छे प्रकार स्थित होता है वैसे अपना वर्त्ताव कीजिये ॥४॥
Essence
इस मंत्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे सूर्य आदि की उत्पत्ति का निमित्त सूर्य आदि लोक का धारण करनेवाला बलवान् सब लोकों और आकर्षणरूपी बल को धारण करता हुआ वायु विचरता है और जैसे सूर्य्यलोक अपने समीप स्थलोंको धारण और सब रूप विषय को प्रकट करता हुआ बल वा आकर्षण शक्ति से सबको धारण करता है और इन दोनों के विना किसी स्थूल वा सूक्ष्म वस्तु के धारण का संभव नहीं होता वैसे ही राजा को होना चाहिये कि उत्तम गुणों से युक्त होकर राज्य का धारण किया करे ॥४॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में उन दोनों के दृष्टान्त से राजकार्य्य का उपदेश किया है।