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Rigveda Mandal 1 / Sukta 35 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/35/2
Devata- सविता Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ वर्त॑मानो निवे॒शय॑न्न॒मृतं॒ मर्त्यं॑ च । हि॒र॒ण्यये॑न सवि॒ता रथे॒ना दे॒वो या॑ति॒ भुव॑नानि॒ पश्य॑न् ॥

आ । कृ॒ष्णेन॑ । रज॑सा । वर्त॑मानः । नि॒ऽवे॒शय॑न् । अ॒मृत॑म् । मर्त्य॑म् । च॒ । हि॒र॒ण्यये॑न । स॒वि॒ता रथे॒न॑ । आ । दे॒वः । या॒ति॒ । भुव॑नानि । पश्य॑न् ॥

Mantra without Swara
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च । हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥

आ । कृष्णेन । रजसा । वर्तमानः । निवेशयन् । अमृतम् । मर्त्यम् । च । हिरण्ययेन । सविता रथेन । आ । देवः । याति । भुवनानि । पश्यन्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
यह (सविता) सब जगत् को उत्पन्न करनेवाला (देवः) सबसे अधिक प्रकाशयुक्त परमेश्वर (आकृष्णेन) अपनी आकर्षण शक्ति से (रजसा) सब सूर्य्यादि लोकों के साथ व्यापक (वर्त्तमानः) हुआ (अमृतम्) अंतर्यामिरूप वा वेद द्वारा मोक्षसाधक सत्य ज्ञान (च) और (मर्त्यम्) कर्मों और प्रलय की व्यवस्था से मरण युक्त जीव को (निवेशयन्) अच्छे प्रकार स्थापन करता हुआ (हिरण्ययेन) यशोमय (रथेन) ज्ञानस्वरूप रथ से युक्त (भुवनानि) लोकों को (पश्यन्) देखता हुआ (आयाति) अच्छे प्रकार सब पदार्थों को प्राप्त होता हैं। १। यह (सविता) प्रकाश वृष्टि और रसों का उत्पन्न करनेवाला (कृष्णेन) प्रकाश रहित (रजसा) पृथिवी आदि लोकों के साथ (आवर्त्तमानः) अपनी आकर्षण शक्ति से वर्त्तमान इस जगत् में (अमृतम्) वृष्टि द्वारा अमृत स्वरूपरस (च) तथा (मर्त्यम्) काल व्यवस्था से मरण को (निवेशयन्) अपने-२ सामर्थ्य में स्थापन करता हुआ (हिरण्ययेन) प्रकाशस्वरूप (रथेन) गमन शक्ति से (भुवनानि) लोकों को (पश्यन्) देखता हुआ (आयाति) अच्छे प्रकार वर्षा आदि रूपों को अलग-२ प्राप्ति करता है ॥२॥
Essence
इस मंत्र में श्लेषालंकार है। जैसे सब पृथिवी आदि लोक मनुष्यादि प्राणियों वा सूर्यलोक अपने आकर्षण में पृथिवी आदि लोकों वा ईश्वर अपनी सत्ता से सूर्यादि सब लोकों का धारण करता है ऐसे क्रम से सब लोकों का धारण होता है इसके विना अन्तरिक्ष में किसी अत्यन्त भार युक्त लोक का अपनी परिधि में स्थिति होने का संभव नहीं होता और लोकों के घूमने विना क्षण, मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, और संवत्सर आदि कालों के अवयव नहीं उत्पन्न हो सकते हैं ॥२॥
Subject
अब अगले मन्त्र में सूर्यलोक के गुणों का उपदेश किया है।