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Rigveda Mandal 1 / Sukta 35 / Mantra 11

191 Sukta
11 Mantra
1/35/11
Devata- सविता Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये ते॒ पन्थाः॑ सवितः पू॒र्व्यासो॑ऽरे॒णवः॒ सुकृ॑ता अ॒न्तरि॑क्षे । तेभि॑र्नो अ॒द्य प॒थिभि॑स्सु॒गेभी॒ रक्षा॑ च नो॒ अधि॑ च ब्रूहि देव ॥

ये । ते॑ । पन्थाः॑ । स॒वि॒त॒रिति॑ । पू॒र्व्यासः॑ । अ॒रे॒णवः॑ । सुऽकृ॑ताः । अ॒न्तरि॑क्षे । तेभिः॑ । नः॒ । अ॒द्य । प॒थिऽभिः॑ । सु॒ऽगेभिः॑ । रक्ष॑ । च॒ । नः॒ । अधि॑ । च॒ । ब्रू॒हि॒ । दे॒व॒ ॥

Mantra without Swara
ये ते पन्थाः सवितः पूर्व्यासोऽरेणवः सुकृता अन्तरिक्षे । तेभिर्नो अद्य पथिभिस्सुगेभी रक्षा च नो अधि च ब्रूहि देव ॥

ये । ते । पन्थाः । सवितरिति । पूर्व्यासः । अरेणवः । सुकृताः । अन्तरिक्षे । तेभिः । नः । अद्य । पथिभिः । सुगेभिः । रक्ष । च । नः । अधि । च । ब्रूहि । देव॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सवितः) सकल जगत् के रचने और (देव) सब सुख देनेवाले जगदीश्वर ! (ये) जो (ते) आपके (अरेणवः) जिनमें कुछ भी धूलि के अंशों के समान विघ्नरूप मल नहीं है तथा (पूर्व्यासः) जो हमारी अपेक्षा से प्राचीनों ने सिद्ध और सेवन किये हैं (सुकृताः) अच्छे प्रकार सिद्ध किये हुए (पन्थाः) मार्ग (अन्तरिक्षे) अपने व्यापकता रूप ब्रह्माण्ड में वर्त्तमान हैं (तेभिः) उन (सुगेभिः) सुखपूर्वक सेवने योग्य (पथिभिः) मार्गो से (नः) हम लोगों को (अद्य) आज (रक्ष) रक्षा कीजिये (च) और (नः) हम लोगों के लिये सब विद्याओं का (अधिब्रूहि) उपदेश (च) भी कीजिये ॥११॥
Essence
हे ईश्वर ! आपने जो सूर्य आदि लोकों के घूमने और प्राणियों के सुख के लिये आकाश वा अपने महिमारूप संसार में शुद्ध मार्ग रचे हैं जिनमें सूर्यादि लोक यथा नियम से घूमते और सब प्राणी विचरते हैं उन सब पदार्थों के मार्गों तथा गुणों का उपदेश कीजिये कि जिससे हम लोग इधर-उधर चलायमान न होवें ॥११॥ इस सूक्त में सूर्यलोक वायु और ईश्वर के गुणों का प्रतिपादन करने से चौतीसवें सूक्त के साथ इस सूक्त की संगति जाननी चाहिये ॥ यह सातवां वर्ग ७ सातवां अनुवाक ७ और पैंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३५॥
Subject
अब अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से ईश्वर का उपदेश किया है।