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Rigveda Mandal 1 / Sukta 35 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/35/10
Devata- सविता Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यहस्तो॒ असु॑रः सुनी॒थः सु॑मृळी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ् । अ॒प॒सेध॑न्र॒क्षसो॑ यातु॒धाना॒नस्था॑द्दे॒वः प्र॑तिदो॒षं गृ॑णा॒नः ॥

हिर॑ण्यऽहस्तः । असु॑रः । सु॒ऽनी॒थः । सु॒ऽमृ॒ळी॒कः । स्वऽवा॑न् । या॒तु॒ । अ॒र्वाङ् । अ॒प॒ऽसेध॑न् । र॒क्षसः॑ । या॒तु॒ऽधाना॑न् । अस्था॑त् । दे॒वः । प्र॑तिऽदो॒षम् । गृ॒णा॒नः ॥

Mantra without Swara
हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ् । अपसेधन्रक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषं गृणानः ॥

हिरण्यहस्तः । असुरः । सुनीथः । सुमृळीकः । स्ववान् । यातु । अर्वाङ् । अपसेधन् । रक्षसः । यातुधानान् । अस्थात् । देवः । प्रतिदोषम् । गृणानः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभापते ! आप जैसे यह (हिरण्यहस्तः) जिसका चलना हाथ के समान है (असुरः) प्राणों की रक्षा करनेवाला रूप गुणरहित (सुनीथः) सुन्दर रीति से सबको प्राप्त होने (सुमृडीकः) उत्तम व्यवहारों से सुखयुक्त करने और (स्ववान्) उत्तम-२ स्पर्श आदि गुणवाला (अर्वाङ्) अपने नीचे ऊपर टेढे जानेवाले वेगों को प्राप्त होता हुआ वायु चारों ओर से चलता है तथा (प्रतिदोषम्) रात्रि-२ के प्रति (गृणानः) गुण कथन से स्तुति करने योग्य (देवः) सुखदायक वायु दुःखों को निवृत्त और सुखों को प्राप्त करके (अस्थात्) स्थित होता है वैसे (रक्षसः) दुष्ट कर्म करनेवाले (यातुधानान्) जिनमें पीड़ा आदि दुःख होते हैं उन डांकुओं को (अपसेधन्) निवारण करते हुए श्रेष्ठों को प्राप्त हूजिये ॥१०॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सभापति जैसे यह वायु अपने आकर्षण और बल आदि गुणों से सब पदार्थों को व्यवस्था में रखता है और जैसे दिन में चोर प्रबल नहीं होसकते हैं वैसे आप भी हूजिये और तुमको जिस जगदीश्वर ने बहुतगुणयुक्त सुख प्राप्त करनेवाले वायु आदि पदार्थ रचे हैं उसीको सब धन्यवाद देने योग्य हैं ॥१०॥
Subject
अब अगले मंत्र में वायु के गुणों का उपदेश किया है।