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Rigveda Mandal 1 / Sukta 34 / Mantra 8

191 Sukta
12 Mantra
1/34/8
Devata- अश्विनौ Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्रिर॑श्विना॒ सिन्धु॑भिः स॒प्तमा॑तृभि॒स्त्रय॑ आहा॒वास्त्रे॒धा ह॒विष्कृ॒तम् । ति॒स्रः पृ॑थि॒वीरु॒परि॑ प्र॒वा दि॒वो नाकं॑ रक्षेथे॒ द्युभि॑र॒क्तुभि॑र्हि॒तम् ॥

त्रिः । आ॒श्वि॒ना॒ । सिन्धु॑ऽभिः । स॒प्तमा॑तृऽभिः । त्रयः॑ । आ॒ऽहा॒वाः । त्रे॒धा । ह॒विः । कृ॒तम् । ति॒स्रः । पृ॒थि॒वीः । उ॒परि॑ । प्र॒वा । दि॒वः । नाक॑म् । र॒क्षे॒थे॒ इति॑ । द्युऽभिः॑ । अ॒क्तुऽभिः॑ । हि॒तम् ॥

Mantra without Swara
त्रिरश्विना सिन्धुभिः सप्तमातृभिस्त्रय आहावास्त्रेधा हविष्कृतम् । तिस्रः पृथिवीरुपरि प्रवा दिवो नाकं रक्षेथे द्युभिरक्तुभिर्हितम् ॥

त्रिः । आश्विना । सिन्धुभिः । सप्तमातृभिः । त्रयः । आहावाः । त्रेधा । हविः । कृतम् । तिस्रः । पृथिवीः । उपरि । प्रवा । दिवः । नाकम् । रक्षेथे इति । द्युभिः । अक्तुभिः । हितम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 2

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Meaning
हे (प्रवा) गमन करानेवाले (अश्विना) सूर्य और वायु के समान कारीगर लोगो ! आप (सप्तमातृभिः) जिनकी सप्त अर्थात् पृथिवी अग्नि सूर्य वायु बिजुली जल और आकाश सात माता के तुल्य उत्पन्न करनेवाले हैं (उन) (सिन्धुभिः) नदियों और (द्युभिः) दिन (अक्तुभिः) रात्रि के साथ जिसके (त्रयः) ऊपर नीचे और मध्य में चलनेवाले (आहावाः) जलाधार मार्ग हैं उस (त्रेधा) तीन प्रकार से (हविष्कृतम्) ग्रहण करने योग्य शोधे हुए (नाकम्) सब दुःखों से रहित (हितम्) स्थित द्रव्य को (उपरि) ऊपर चढ़ा के (तिस्रः) स्थूल त्रसरेणु और परमाणु नामवाली तीन प्रकार की (पृथिवीः) विस्तार युक्त पृथिवी और (दिवः) प्रकाशस्वरूप किरणों को प्राप्त कराके उसको इधर-उधर चला और नीचे वर्षा के इससे सब जगत् की (त्रिः) तीन बार (रक्षेथे) रक्षा कीजिये ॥८॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि जो सूर्य वायु के छेदन आकर्षण और वृष्टि करानेवाले गुणों से नदियाँ चलती तथा हवन किया हुआ द्रव्य दुर्गन्धादि दोषों को निवारण कर सब दुःखों से रहित सुखों को सिद्ध करता है जिससे दिन रात सुख बढ़ता है इसके विना कोई प्राणी जीवने को समर्थ नहीं हो सकता इससे इसकी शुद्धि के लिये यज्ञरूप कर्म नित्य करें ॥८॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, और उनसे क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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