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Rigveda Mandal 1 / Sukta 34 / Mantra 5

191 Sukta
12 Mantra
1/34/5
Devata- अश्विनौ Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्रिर्नो॑ र॒यिं व॑हतमश्विना यु॒वं त्रिर्दे॒वता॑ता॒ त्रिरु॒ताव॑तं॒ धियः॑ । त्रिः सौ॑भग॒त्वं त्रिरु॒त श्रवां॑सि नस्त्रि॒ष्ठं वां॒ सूरे॑ दुहि॒ता रु॑ह॒द्रथ॑म् ॥

त्रिः । नः॑ । र॒यिम् । व॒ह॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वम् । त्रिः । दे॒वता॑ता । त्रिः । उ॒त । अ॒व॒त॒म् । धियः॑ । त्रिः । सौ॒भ॒ग॒ऽत्वम् । त्रिः । उ॒त । श्रवां॑सि । नः॒ । त्रिः॒ऽस्थम् । वा॒म् । सूरे॑ । दु॒हि॒ता । रु॒ह॒त् । रथ॑म् ॥

Mantra without Swara
त्रिर्नो रयिं वहतमश्विना युवं त्रिर्देवताता त्रिरुतावतं धियः । त्रिः सौभगत्वं त्रिरुत श्रवांसि नस्त्रिष्ठं वां सूरे दुहिता रुहद्रथम् ॥

त्रिः । नः । रयिम् । वहतम् । अश्विना । युवम् । त्रिः । देवताता । त्रिः । उत । अवतम् । धियः । त्रिः । सौभगत्वम् । त्रिः । उत । श्रवांसि । नः । त्रिःस्थम् । वाम् । सूरे । दुहिता । रुहत् । रथम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 5

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Meaning
हे (देवताता) शिल्प क्रिया और यज्ञ संपत्ति के मुख्य कारण वा विद्वान् तथा शुभगुणों के बढ़ाने और (अश्विना) आकाश पृथिवी के तुल्य प्राणियों को सुख देनेवाले विद्वान् लोगो ! (युवम्) आप (नः) हम लोगों के लिये (रयिम्) उत्तम धन (त्रिः) तीन बार अर्थात् विद्या राज्य श्री की प्राप्ति और रक्षण क्रियारूप ऐश्वर्य्य को (वहतम्) प्राप्त करो (नः) हम लोगों की (धियः) बुद्धियों (उत) और बल को (त्रिः) तीन बार (अवतम्) प्रवेश कराइये (नः) हम लोगों के लिये (त्रिष्ठम्) तीन अर्थात् शरीर आत्मा और मन के सुख में रहने और (सौभगत्वम्) उत्तम ऐश्वर्य्य के उत्पन्न करनेवाले पुरुषार्थ को (त्रिः) तीन अर्थात् भृत्य, संतान और स्वात्म भार्यादि को प्राप्त कीजिये (उत) और (श्रवांसि) वेदादि शास्त्र वा धनों को (त्रिः) शरीर प्राण और मन की रक्षा सहित प्राप्त करते और (वाम्) जिन अश्वियों के सकाश से (सूरेः) सूर्य की (दुहिता) पुत्री के समान कान्ति (नः) हम लोगों के (रथम्) विमानादि यानसमूह को (त्रिः) तीन अर्थात् प्रेरक साधक और चाकन क्रिया से (आरुहत्) ले जाती है उन दोनों को हम लोग शिल्प कार्यों में अच्छे प्रकार युक्त करें ॥५॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि अग्नि भूमि के अवलंब से शिल्प कार्यों की सिद्ध और बुद्धि बढ़ाकर सौभाग्य और उत्तम अन्नादि पदार्थों को प्राप्त हो इस सब सामग्री से सिद्ध हुए यानों में बैठ के देश देशान्तरों को जा-आ और व्यवहार द्वारा धन को बढ़ाकर सब काल में आनन्द में रहें ॥५॥
Subject
फिर वे किस कार्य के साधक हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

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