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Rigveda Mandal 1 / Sukta 34 / Mantra 4

191 Sukta
12 Mantra
1/34/4
Devata- अश्विनौ Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रिर्व॒र्तिर्या॑तं॒ त्रिरनु॑व्रते॒ जने॒ त्रिः सु॑प्रा॒व्ये॑ त्रे॒धेव॑ शिक्षतम् । त्रिर्ना॒न्द्यं॑ वहतमश्विना यु॒वं त्रिः पृक्षो॑ अ॒स्मे अ॒क्षरे॑व पिन्वतम् ॥

त्रिः । व॒र्तिः । या॒त॒म् । त्रिः । अनु॑ऽव्रते । जने॑ । त्रिः । सु॒प्र॒ऽअ॒व्ये॑ । त्रे॒धाऽइ॑व । शि॒क्ष॒त॒म् । त्रिः । ना॒न्द्य॑म् । व॒ह॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वम् । त्रिः । पृक्षः॑ । अ॒स्मे इति॑ । अ॒क्षरा॑ऽइव । पि॒न्व॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
त्रिर्वर्तिर्यातं त्रिरनुव्रते जने त्रिः सुप्राव्ये त्रेधेव शिक्षतम् । त्रिर्नान्द्यं वहतमश्विना युवं त्रिः पृक्षो अस्मे अक्षरेव पिन्वतम् ॥

त्रिः । वर्तिः । यातम् । त्रिः । अनुव्रते । जने । त्रिः । सुप्रअव्ये । त्रेधाइव । शिक्षतम् । त्रिः । नान्द्यम् । वहतम् । अश्विना । युवम् । त्रिः । पृक्षः । अस्मे इति । अक्षराइव । पिन्वतम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 4

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Meaning
हे (अश्विना) विद्या देने वा ग्रहण करनेवाले विद्वान् मनुष्यो ! (युवम्) तुम दोनों (अस्मे) हम लोगों के (वर्त्तिः) मार्ग को (त्रिः) तीन बार (यातम्) प्राप्त हुआ करो। तथा (सुप्राव्ये) अच्छे प्रकार प्रवेश करने योग्य (अनुव्रते) जिसके अनुकूल सत्याचरण व्रत है उस (जने) बुद्धि के उत्पादन करनेवाले मनुष्य के निमित्त (त्रिः) तीन बार (यातम्) प्राप्त हूजिये और शिष्य के लिये (त्रेधेव) तीन प्रकार अर्थात् हस्तक्रिया रक्षा और यान चालन के ज्ञान को शिक्षा करते हुए अध्यापक के समान (अस्मे) हम लोगों को (त्रिः) तीन बार (शिक्षतम्) शिक्षा और (नाद्यम्) समृद्धि होने योग्य शिल्प ज्ञान को (त्रिः) तीन बार (वहतम्) प्राप्त करो और (अक्षरेव) जैसे नदी तलाब और समुद्र आदि जलाशय मेघ के सकाश से जल को प्राप्त होते हैं वैसे हम लोगों को (पृक्षः) विद्यासंपर्क को (त्रिः) तीन बार (पिन्वतम्) प्राप्त करो ॥४॥
Essence
इस मंत्र में दो उपमालङ्कार हैं। शिल्प विद्या के जाननेवाले मनुष्यों को योग्य है कि विद्या की इच्छा करनेवाले अनुकूल बुद्धिमान मनुष्यों को पदार्थ विद्या पढ़ा और उत्तम-२ शिक्षा बार-२ देकर कार्यों को सिद्ध करने में समर्थ करें और उनको भी चाहिये कि इस विद्या को संपादन करके यथावत् चतुराई और पुरुषार्थ से सुखों के उपकारों को ग्रहण करें ॥४॥
Subject
फिर उनसे क्या कार्य करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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