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Rigveda Mandal 1 / Sukta 34 / Mantra 3

191 Sukta
12 Mantra
1/34/3
Devata- अश्विनौ Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स॒मा॒ने अह॒न्त्रिर॑वद्यगोहना॒ त्रिर॒द्य य॒ज्ञं मधु॑ना मिमिक्षतम् । त्रिर्वाज॑वती॒रिषो॑ अश्विना यु॒वं दो॒षा अ॒स्मभ्य॑मु॒षस॑श्च पिन्वतम् ॥

स॒मा॒ने । अह॑न् । त्रिः । अ॒व॒द्य॒ऽगो॒ह॒ना॒ । त्रिः । अ॒द्य । य॒ज्ञम् । मधु॑ना । मि॒मि॒क्ष॒त॒म् । त्रिः । वाज॑वतीः । इषः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वम् । दो॒षा । अ॒स्मभ्य॑म् । उ॒षसः॑ । च॒ । पि॒न्व॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
समाने अहन्त्रिरवद्यगोहना त्रिरद्य यज्ञं मधुना मिमिक्षतम् । त्रिर्वाजवतीरिषो अश्विना युवं दोषा अस्मभ्यमुषसश्च पिन्वतम् ॥

समाने । अहन् । त्रिः । अवद्यगोहना । त्रिः । अद्य । यज्ञम् । मधुना । मिमिक्षतम् । त्रिः । वाजवतीः । इषः । अश्विना । युवम् । दोषा । अस्मभ्यम् । उषसः । च । पिन्वतम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) अग्नि जल के समान यानों को सिद्ध करके प्रेरणा करने और चलाने तथा (अवद्यगोहना) निंदित दुष्ट कर्मों को दूर करनेवाले विद्वान् मनुष्यो ! (युवम्) तुम दोनों (समाने) एक (अहन्) दिन में (मधुना) जल से (यज्ञम्) ग्रहण करने योग्य शिल्पादि विद्या सिद्धि करनेवाले यज्ञ को (त्रिः) तीन बार (मिमिक्षितम्) सींचने की इच्छा करो और (अद्य) आज (अस्मभ्यम्) शिल्पक्रियाओं को सिद्ध करने करानेवाले हम लोगों के लिये (दोषाः) रात्रियों और (उषसः) प्रकाश को प्राप्त हुए दिनों में (त्रिः) तीन बार यानों का (पिन्वतम्) सेवन करो और (वाजवतीः) उत्तम-२ सुखदायक (इषः) इच्छा सिद्धि करनेवाले नौकादि यानों को (त्रिः) तीन बार (पिन्वतम्) प्रीति से सेवन करो ॥३॥
Essence
शिल्पविद्या को जानने और कलायंत्रों से यान को चलानेवाले प्रति दिन शिल्पविद्या से यानों को सिद्ध कर तीन प्रकार अर्थात् शारीरिक आत्मिक और मानसिक सुख के लिये धन आदि अनेक उत्तम-२ पदार्थों को इकट्ठा कर सब प्राणियों को सुखयुक्त करें जिससे दिन-रात में सब लोग अपने पुरुषार्थ से इस विद्या की उन्नति कर और आलस्य को छोड़के उत्साह से उसकी रक्षा में निरन्तर प्रयत्न करें ॥३॥
Subject
फिर उनसे सिद्ध किये हुए यानों से क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।