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Rigveda Mandal 1 / Sukta 34 / Mantra 2

191 Sukta
12 Mantra
1/34/2
Devata- अश्विनौ Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्रयः॑ प॒वयो॑ मधु॒वाह॑ने॒ रथे॒ सोम॑स्य वे॒नामनु॒ विश्व॒ इद्वि॑दुः । त्रयः॑ स्क॒म्भासः॑ स्कभि॒तास॑ आ॒रभे॒ त्रिर्नक्तं॑ या॒थस्त्रिर्व॑श्विना॒ दिवा॑ ॥

त्रयः॑ । प॒वयः॑ । मधु॒ऽवाहे॑न । रथे॑ । सोम॑स्य । वे॒नाम् । अनु॑ । विश्वे॑ । इत् । वि॒दुः॒ । त्रयः॑ । स्क॒म्भासः॑ । स्क॒मि॒तासः॑ । आ॒ऽरभे॑ । त्रिः । नक्त॑म् । या॒थः । त्रिः । ऊँ॒ इति॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । दिवा॑ ॥

Mantra without Swara
त्रयः पवयो मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इद्विदुः । त्रयः स्कम्भासः स्कभितास आरभे त्रिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा ॥

त्रयः । पवयः । मधुवाहेन । रथे । सोमस्य । वेनाम् । अनु । विश्वे । इत् । विदुः । त्रयः । स्कम्भासः । स्कमितासः । आरभे । त्रिः । नक्तम् । याथः । त्रिः । ऊँ इति । अश्विना । दिवा॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे अश्वि अर्थात् वायु और बिजुली के समान संपूर्ण शिल्प विद्याओं को यथावत् जाननेवाले विद्वान् लोगो ! आप जिस (मधुवाहने) मधुर गुणयुक्त द्रव्यों की प्राप्ति होने के हेतु (रथे) विमान में (त्रयः) तीन (पवयः) वज्र के समान कला घूमने के चक्र और (त्रयः) तीन (स्कम्भासः) बन्धन के लिये खंभ (स्कभितासः) स्थापित और धारण किये जाते हैं, उसमें स्थित और अग्नि और जल के समान कार्य्यसिद्धि करके (त्रिः) तीन बार (नक्तम्) रात्रि और (त्रिः) तीन बार (दिवा) दिन में इच्छा किये हुए स्थान को (उपयाथः) पहुंचो वहां भी आपके विना कार्य्य सिद्धि कदापि नहीं होती मनुष्य लोग जिसमें बैठके (सोमस्य) ऐश्वर्य की (वेनां) प्राप्ति को करती हुई कामना वा चन्द्रलोक कीइकान्ति को प्राप्त होते और जिसके (आरभे) आरम्भ करने योग्य गमनागमन व्यवहार में (विश्वे) सब विद्वान् (इत्) ही (विदुः) जानते हैं उस (उ) अद्भुत रथ को ठीक-२ सिद्ध कर अभीष्ठस्थानों में शीघ्र जाया आया करो ॥२॥
Essence
भूमि समुद्र और अन्तरिक्ष में जाने की इच्छा करनेवाले मनुष्यों को योग्य है कि तीन-२ चक्र युक्त अग्नि के घर और स्तंभयुक्त यान को रचकर उसमें बैठ कर एक दिन-रात में भूगोल समुद्र अन्तरिक्ष मार्ग से तीन-२ बार जानेको समर्थ हो सकें उस यान में इस प्रकार के खंभ रचने चाहिये कि जिसमें कलावयव अर्थात् काष्ठ लोष्ठ आदि खंभों के अवयव स्थित हो फिर वहां अग्नि जल का संप्रयोग कर चलावें। क्योंकि इनके विना कोई मनुष्य शीघ्र भूमि समुद्र अन्तरिक्ष में जाने आने को समर्थ नहीं हो सकता इससे इनकी सिद्धि के लिये सब मनुष्यों को बड़े-२ यत्न अवश्य करने चाहियें ॥२॥
Subject
फिर उनसे क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।