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Rigveda Mandal 1 / Sukta 34 / Mantra 11

191 Sukta
12 Mantra
1/34/11
Devata- अश्विनौ Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ ना॑सत्या त्रि॒भिरे॑काद॒शैरि॒ह दे॒वेभि॑र्यातं मधु॒पेय॑मश्विना । प्रायु॒स्तारि॑ष्टं॒ नी रपां॑सि मृक्षतं॒ सेध॑तं॒ द्वेषो॒ भव॑तं सचा॒भुवा॑ ॥

आ । ना॒स॒त्या॒ । त्रि॒भिः । ए॒का॒द॒शैः । इ॒ह । दे॒वेभिः॑ । या॒त॒म् । म॒धु॒ऽपेय॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । प्र । आयुः॑ । तारि॑ष्टम् । निः । रपां॑सि । मृ॒क्ष॒त॒म् । सेध॑तम् । द्वेषः॑ । भव॑तम् । स॒चा॒ऽभुवा॑ ॥

Mantra without Swara
आ नासत्या त्रिभिरेकादशैरिह देवेभिर्यातं मधुपेयमश्विना । प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा ॥

आ । नासत्या । त्रिभिः । एकादशैः । इह । देवेभिः । यातम् । मधुपेयम् । अश्विना । प्र । आयुः । तारिष्टम् । निः । रपांसि । मृक्षतम् । सेधतम् । द्वेषः । भवतम् । सचाभुवा॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे शिल्पिलोगो ! तुम दोनों (नासत्या) सत्यगुण स्वभाव युक्त (सचाभुवा) मेल करानेवाले जल और अग्नि के समान (देवेभिः) विद्वानों के साथ (इह) इन उत्तम यानों में बैठ के (त्रिभिः) तीन दिन और तीन रात्रियों में महासमुद्र के पार और (एकादशभिः) ग्यारह दिन और ग्यारह रात्रियों में भूगोल पृथिवी के अन्त को (यातम्) पहुंचो (द्वेषः) शत्रु और (रपांसि) पापों को (निर्मृक्षतम्) अच्छे प्रकार दूर करो (मधुपेयम्) मधुर गुण युक्त पीने योग्य द्रव्य और (आयुः) उमर को (प्रतारिष्टम्) प्रयत्न से बढ़ाओ उत्तम सुखों को (सेधतम्) सिद्ध करो और शत्रुओं को जीतनेवाले (भवतम्) होओ ॥११॥
Essence
जब मनुष्य ऐसे यानों में बैठ और उनको चलाते हैं तब तीन दिन और तीन रात्रियों में सुख से समुद्र के पार तथा ग्यारह दिन और ग्यारह रात्रियों में ब्रह्माण्ड के चारों ओर जाने को समर्थ हो सकते हैं इसी प्रकार करते हुए विद्वान् लोग सुखयुक्त पूर्ण आयु को प्राप्त हो दुःखों को दूर और शत्रुओं को जीतकर चक्रवर्त्तिराज्य भोगनेवाले होते हैं ॥११॥
Subject
फिर उनसे क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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