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Rigveda Mandal 1 / Sukta 34 / Mantra 10

191 Sukta
12 Mantra
1/34/10
Devata- अश्विनौ Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ ना॑सत्या॒ गच्छ॑तं हू॒यते॑ ह॒विर्मध्वः॑ पिबतं मधु॒पेभि॑रा॒सभिः॑ । यु॒वोर्हि पूर्वं॑ सवि॒तोषसो॒ रथ॑मृ॒ताय॑ चि॒त्रं घृ॒तव॑न्त॒मिष्य॑ति ॥

आ । ना॒स॒त्या॒ । गच्छ॑तम् । हू॒यते॑ । ह॒विः । मध्वः॑ । पि॒ब॒त॒म् । म॒धु॒ऽपेभिः॑ । आ॒सऽभिः॑ । यु॒वोः । हि । पूर्व॑म् । स॒वि॒ता । उ॒षसः॑ । रथ॑म् । ऋ॒ताय॑ । चि॒त्रम् । घृ॒तऽव॑न्तम् । इष्य॑ति ॥

Mantra without Swara
आ नासत्या गच्छतं हूयते हविर्मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिः । युवोर्हि पूर्वं सवितोषसो रथमृताय चित्रं घृतवन्तमिष्यति ॥

आ । नासत्या । गच्छतम् । हूयते । हविः । मध्वः । पिबतम् । मधुपेभिः । आसभिः । युवोः । हि । पूर्वम् । सविता । उषसः । रथम् । ऋताय । चित्रम् । घृतवन्तम् । इष्यति॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे शिल्पिलोगो ! तुम दोनों (नासत्या) जल और अग्नि के सदृश जिस (हविः) सामग्री का (हूयते) हवन करते हो उस हवि से शुद्ध हुए (मध्वः) मीठे जल (मधुपेभिः) मीठे मीठे जल पीनेवाले (आसभिः) अपने मुखों से (पिबतम्) पियो और हम लोगों को आनन्द देने के लिये (घृतवन्तम्) बहुत जल की कलाओं से युक्त (चित्रम्) वेगादि आश्चर्य्य गुणसहित (रथम्) विमानादि यानों से देशान्तरों को (गच्छतम्) शीघ्र जाओं आओ (युवाः) तुम्हारा जो रथ (उषसः) प्रातःकाल से (पूर्वम्) पहिले (सविता) सूर्यलोक के समान प्रकाशमान (इष्यति) शीघ्र चलता है (हि) वही (ऋताय) सत्य सुख के लिये समर्थ होता है ॥१०॥
Essence
जब यानों में जल और अग्नि को प्रदीप्त करके चलाते हैं तब ये यान और स्थानों को शीघ्र प्राप्त कराते हैं उनमें जल और बाफ के निकलने का एक ऐसा स्थान रच लेवें कि जिसमें होकर बाफ के निकलने से वेग की वृद्धि होवे। इस विद्या का जाननेवाला ही अच्छे प्रकार सुखों को प्राप्त होता है ॥१०॥
Subject
फिर उनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।