Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 9

191 Sukta
15 Mantra
1/33/9
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परि॒ यदि॑न्द्र॒ रोद॑सी उ॒भे अबु॑भोजीर्महि॒ना वि॒श्वतः॑ सीम् । अम॑न्यमानाँ अ॒भि मन्य॑मानै॒र्निर्ब्र॒ह्मभि॑रधमो॒ दस्यु॑मिन्द्र ॥

परि॑ । यत् । इ॒न्द्र॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । अबु॑भोजीः । म॒हि॒ना । वि॒श्वतः॑ । सी॒म् । अम॑न्यमानान् । अ॒भि । मन्य॑मानैः । निः । ब्र॒ह्मऽभिः॑ । अ॒ध॒मः॒ । दस्यु॑म् । इ॒न्द्र॒ ॥

Mantra without Swara
परि यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम् । अमन्यमानाँ अभि मन्यमानैर्निर्ब्रह्मभिरधमो दस्युमिन्द्र ॥

परि । यत् । इन्द्र । रोदसी इति । उभे इति । अबुभोजीः । महिना । विश्वतः । सीम् । अमन्यमानान् । अभि । मन्यमानैः । निः । ब्रह्मभिः । अधमः । दस्युम् । इन्द्र॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 2 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य्य का योग करनेवाले राजन् ! आपको योग्य है कि जैसे सूर्य्यलोक (महिना) अपनी महिमा से (उभे) दोनों (रोदसी) प्रकाश और भूमि को (सीम्) जीवों के सुख की प्राप्ति के लिये (विश्वतः) सब प्रकार आकर्षण से पालन करता और (मन्यमानैः) ज्ञानसंपादक (ब्रह्मभिः) बड़े आकर्षणादि बलयुक्त किरणों से (दस्युम्) मेघ और (अमन्यमानान्) सूर्य्यप्रकाश के रोकनेवाले मेघ के अवयवों को (निरधमः) चारों ओर से अपने तापरूप अग्नि करके निवारण करता है वैसे सब प्रकार अपनी महिमा से प्राणियों के सुख के लिये (उभे) दोनों (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी का (पर्य्यबुभोजीः) भोग कीजिये इसी प्रकार हे (इन्द्र) राज्य के ऐश्वर्य्य से युक्त सेनाध्यक्ष शूरवीर पुरुष आप (मन्यमानैः) विद्या की नम्रता से युक्त हठ दुराग्रह रहित (ब्रह्मभिः) वेद के जाननेवाले विद्वानों से (अमन्यमानान्) अज्ञानी दुराग्रही मनुष्यों को (अभिनिरधमः) साक्षात्कार शिक्षा कराया कीजिये ॥९॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्यलोक सब पृथिव्यादि मूर्त्तिमान् लोकों का प्रकाश आकर्षण से धारण और पालन करनेवाला होकर मेघ और रात्रि के अन्धकार को निवारण करता है वैसे ही हे मनुष्यो आप लोग उत्तम शिक्षित विद्वानों से मूर्खों को मूढ़ेता छुड़ा और दुष्ट शत्रुओं को शिक्षा देकर बड़े राज्य के सुख का भोग नित्य कीजिये ॥९॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में इन्द्र के कृत्य का उपदेश किया है।