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Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 8

191 Sukta
15 Mantra
1/33/8
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च॒क्रा॒णासः॑ परी॒णहं॑ पृथि॒व्या हिर॑ण्येन म॒णिना॒ शुम्भ॑मानाः । न हि॑न्वा॒नास॑स्तितिरु॒स्त इन्द्रं॒ परि॒ स्पशो॑ अदधा॒त्सूर्ये॑ण ॥

च॒का॒णासः॑ । प॒रि॒ऽनह॑म् । पृ॒थि॒व्याः । हिर॑ण्येन । म॒णिना॑ । शुम्भ॑मानाः । न । हि॒न्वा॒नासः॑ । ति॒ति॒रुः॒ । ते । इन्द्र॑म् । परि॑ । स्पशः॑ । अ॒द॒धा॒त् । सूर्ये॑ण ॥

Mantra without Swara
चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमानाः । न हिन्वानासस्तितिरुस्त इन्द्रं परि स्पशो अदधात्सूर्येण ॥

चकाणासः । परिनहम् । पृथिव्याः । हिरण्येन । मणिना । शुम्भमानाः । न । हिन्वानासः । तितिरुः । ते । इन्द्रम् । परि । स्पशः । अदधात् । सूर्येण॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 2 Mantra » 3

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Meaning
जैसे जिनको सूर्य्य (पर्य्यदधात्) सब ओर से धारण करता है (ते) वे मेघ के अवयव बादल सूर्य के प्रकाश को (स्पशः) बाधनेवाले (पृथिव्याः) पृथिवी को (परीणहम्) चौतर्फी घेरे हुए के समान (चक्राणासः) युद्ध करते हुए (हिरण्येन) प्रकाशरूप (मणिना) मणि से जैसे (सूर्य्येण) सूर्य्य के तेज से (शुम्भमानाः) शोभायमान (हिन्वानासः) सुखों को संपादन करते हुए (इन्द्रम्) सूर्यलोक को (न) नहीं (तितिरुः) उल्लंघन कर सकते हैं वैसे ही सेनाध्यक्ष अपने धार्मिक शूरवीर आदि को शत्रुजन जैसे जीतने को समर्थ न हों वैसा प्रयत्न सब लोग किया करें ॥८॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर ने सूर्य के साथ प्रकाश आकर्षणादि कर्मों का निबन्धन किया है वैसे ही विद्या धर्म न्याय शूरवीरों की सेनादि सामग्री को प्राप्त हुए पुरुष के साथ इस पृथिवी के राज्य को नियुक्त किया है ॥८॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में इन्द्र के कृत्य का उपदेश किया है।

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