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Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/33/7
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वमे॒तान्रु॑द॒तो जक्ष॑त॒श्चायो॑धयो॒ रज॑स इन्द्र पा॒रे । अवा॑दहो दि॒व आ दस्यु॑मु॒च्चा प्र सु॑न्व॒तः स्तु॑व॒तः शंस॑मावः ॥

त्वम् । ए॒तान् । रु॒द॒तः । जक्ष॑तः । च॒ । अयो॑धयः । रज॑सः । इ॒न्द्र॒ । पा॒रे । अव॑ । अ॒द॒हः॒ । दि॒वः । आ । दस्यु॑म् । उ॒च्चा । प्र । सु॒न्व॒तः । स्तु॒व॒तः । शंस॑म् । आ॒वः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वमेतान्रुदतो जक्षतश्चायोधयो रजस इन्द्र पारे । अवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वतः स्तुवतः शंसमावः ॥

त्वम् । एतान् । रुदतः । जक्षतः । च । अयोधयः । रजसः । इन्द्र । पारे । अव । अदहः । दिवः । आ । दस्युम् । उच्चा । प्र । सुन्वतः । स्तुवतः । शंसम् । आवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 2 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) सेना के ऐश्वर्य से युक्त सेनाध्यक्ष ! (त्वम्) आप (एतान्) इन दूसरों को पीड़ा देने दुष्टकर्म करनेवाले (रुदतः) रोते हुए जीवों (च) और (दस्युम्) डाकुओं को दण्ड दीजिये तथा अपने भृत्यों को (जक्षतः) अनेक प्रकार के भोजन आदि देते हुए आनन्द करनेवाले मनुष्यों को उनके साथ (अयोधयः) अच्छे प्रकार युद्ध कराइये और इन धर्म के शत्रुओं को (रजसः) पृथिवी लोक के (पारे) परभाग में करके (अवादहः) भस्म कीजिये इसी प्रकार (दिवः) उत्तम शिक्षा से ईश्वर धर्म शिल्प युद्धविद्या और परोपकार आदि के प्रकाशन से (उच्चा) उत्तम-२ कर्म वा सुखों को (प्रसुन्वतः) सिद्ध करने तथा (आस्तुवतः) गुणस्तुति करनेवालों की (आवः) रक्षा कीजिये और उनकी (शंसम्) प्रशंसा को प्राप्त हूजिये ॥७॥
Essence
मनुष्यों को युद्ध के लिये अनेक प्रकार के कर्म करने अर्थात् पहिले अपनी सेना के मनुष्यों की पुष्टि आनन्द तथा दुष्टों का दुर्बलपन वा उत्साहभंग नित्य करना चाहिये जैसे सूर्य अपनी किरणों से सबको प्रकाशित करके मेघ के अन्धकार निवारण के लिये प्रवृत्त होता है वैसे सब काल में उत्तम कर्म वा गुणों के प्रकाश और दुष्ट कर्म दोषों की निवृत्ति के लिये नित्य यत्न करना चाहिये ॥७॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में इन्द्रशब्द से शूरवीर के काम का उपदेश किया है।

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