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Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 6

191 Sukta
15 Mantra
1/33/6
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अयु॑युत्सन्ननव॒द्यस्य॒ सेना॒मया॑तयन्त क्षि॒तयो॒ नव॑ग्वाः । वृ॒षा॒युधो॒ न वध्र॑यो॒ निर॑ष्टाः प्र॒वद्भि॒रिन्द्रा॑च्चि॒तय॑न्त आयन् ॥

अयु॑युत्सन् । अ॒न॒व॒द्यस्य॑ । सेना॑म् । अया॑तयन्त । क्षि॒तयः॑ । नव॑ऽग्वाः । वृ॒ष॒ऽयुधः॑ । न । वध्र॑यः । निःऽअ॑ष्टाः । प्र॒ऽवत्ऽभिः॑ । इन्द्रा॑त् । चि॒तय॑न्तः । आ॒य॒न् ॥

Mantra without Swara
अयुयुत्सन्ननवद्यस्य सेनामयातयन्त क्षितयो नवग्वाः । वृषायुधो न वध्रयो निरष्टाः प्रवद्भिरिन्द्राच्चितयन्त आयन् ॥

अयुयुत्सन् । अनवद्यस्य । सेनाम् । अयातयन्त । क्षितयः । नवग्वाः । वृषयुधः । न । वध्रयः । निःअष्टाः । प्रवत्भिः । इन्द्रात् । चितयन्तः । आयन्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 2 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नवग्वाः) नवीन-२ शिक्षा वा विद्या के प्राप्त करने और कराने (वृषायुधः) अतिप्रबल शत्रुओं के साथ युद्ध करने (चितयन्तः) युद्धविद्या से युक्त (क्षितयः) मनुष्य लोगो आप (अनवद्यस्य) जिस उत्तम गुणों से प्रशंसनीय सेनाध्यक्ष की (सेनाम्) सेना को (अयातयन्त) उत्तम शिक्षा से यत्नवाली करके शत्रुओं के साथ (अयुयुत्सन्) युद्ध की इच्छा करो जिस (इन्द्रात्) शूरवीर सेनाध्यक्ष से (वध्रयः) निर्बल नपुसकों के (न) समान शत्रुलोग (निरष्टाः) दूर-२ भागते हुए (प्रवद्भिः) पलायन योग्य मार्गों से (आयन्) निकल जावें उस पुरुष को सेनापति कीजिये ॥६॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य शरीर और आत्मबलवाले शूरवीर धार्मिक मनुष्य को सेनाध्यक्ष और सर्वथा उत्तम सेना को संपादन करके जब दुष्टों के साथ युद्ध करते हैं तभी जैसे सिंह के समीप बकरी और मनुष्य के समीप से भीरु मनुष्य और सूर्य्य के ताप से मेघ के अवयव नष्ट होते हैं वैसे ही उक्त वीरों के समीप से शत्रु लोग सुख से रहित और पीठ दिखाकर इधर-उधर भाग जाते हैं इससे सब मनुष्यों को इस प्रकार का सामर्थ्य संपादन करके राज्य का भोग सदा करना चाहिये ॥६॥
Subject
फिर उसका क्या कार्य है, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है।