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Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 5

191 Sukta
15 Mantra
1/33/5
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परा॑ चिच्छी॒र्षा व॑वृजु॒स्त इ॒न्द्राय॑ज्वानो॒ यज्व॑भिः॒ स्पर्ध॑मानाः । प्र यद्दि॒वो ह॑रिवः स्थातरुग्र॒ निर॑व्र॒ताँ अ॑धमो॒ रोद॑स्योः ॥

परा॑ । चि॒त् । शी॒र्षा । व॒वृ॒जुः॒ । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । अय॑ज्वानः । यज्व॑ऽभिः । स्पर्ध॑मानाः । प्र । यत् । दि॒वः । ह॒रि॒ऽवः॒ । स्था॒तः॒ । उ॒ग्र॒ । निः । अ॒व्र॒तान् । अ॒ध॒मः॒ । रोद॑स्योः ॥

Mantra without Swara
परा चिच्छीर्षा ववृजुस्त इन्द्रायज्वानो यज्वभिः स्पर्धमानाः । प्र यद्दिवो हरिवः स्थातरुग्र निरव्रताँ अधमो रोदस्योः ॥

परा । चित् । शीर्षा । ववृजुः । ते । इन्द्र । अयज्वानः । यज्वभिः । स्पर्धमानाः । प्र । यत् । दिवः । हरिवः । स्थातः । उग्र । निः । अव्रतान् । अधमः । रोदस्योः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 5

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Meaning
हे (हरिवः) प्रशंसित सेना आदि के साधन घोड़े हाथियों से युक्त (प्रस्थातः) युद्ध में स्थित होने और (उग्र) दुष्टों के प्रति तीक्ष्णव्रत धारण करनेवाले (इन्द्र) सेनापति ! (चित्) जैसे हरण आकर्षण गुण युक्त किरणवान् युद्ध में स्थित होने और दुष्टों को अत्यन्त ताप देनेवाला सूर्यलोक (रोदस्योः) अन्तरिक्ष और पृथिवी का प्रकाश और आकर्षण करता हुआ मेघ के अवयवों को छिन्न-भिन्न कर उसका निवारण करता है वैसे आप (यत्) जो (अयज्वानः) यज्ञ के न करनेवाले (यज्वभिः) यज्ञ के करनेवालों से (स्पर्द्धमानाः) ईर्षा करते हैं वे जैसे (शीर्षाः) अपने शिरों को (ते) तुम्हारे सकाश से (ववृजुः) छोड़नेवाले हों वैसे उन (अव्रतान्) सत्याचरण आदि व्रतों से रहित मनुष्यों को (निरधमः) अच्छे प्रकार दण्ड देकर शिक्षा कीजिये ॥५॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य दिन और पृथिवी और प्रकाश को धारण तथा मेघ रूप अन्धकार को निवारण करके वृष्टि द्वारा सब प्राणियों को सुख युक्त करता है वैसे ही मनुष्यों को उत्तम-२ गुणों का धारण खोटे गुणों को छोड़ धार्मिकों की रक्षा और अधर्मी दुष्ट मनुष्यों को दंड देकर विद्या उत्तम शिक्षा और धर्मोपदेश की वर्षा से सब प्राणियों को सुख देके सत्य के राज्य का प्रचार करना चाहिये ॥५॥
Subject
अब अगले मन्त्र में इन्द्रशब्द से शूरवीर के काम का उपदेश किया है।

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