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Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 3

191 Sukta
15 Mantra
1/33/3
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नि सर्व॑सेन इषु॒धीँर॑सक्त॒ सम॒र्यो गा अ॑जति॒ यस्य॒ वष्टि॑ । चो॒ष्कू॒यमा॑ण इन्द्र॒ भूरि॑ वा॒मं मा प॒णिर्भू॑र॒स्मदधि॑ प्रवृद्ध ॥

नि । सर्व॑ऽसेनः । इ॒षु॒ऽधीन् । अ॒स॒क्त॒ । सम् । अ॒र्यः । गाः । अ॒ज॒ति॒ । यस्य॑ । वष्टि॑ । चो॒ष्कू॒यमा॑णः । इ॒न्द्र॒ । भूरि॑ । वा॒मम् । मा । प॒णिः । भूः॒ । अ॒स्मत् । अधि॑ । प्र॒ऽवृ॒द्ध॒ ॥

Mantra without Swara
नि सर्वसेन इषुधीँरसक्त समर्यो गा अजति यस्य वष्टि । चोष्कूयमाण इन्द्र भूरि वामं मा पणिर्भूरस्मदधि प्रवृद्ध ॥

नि । सर्वसेनः । इषुधीन् । असक्त । सम् । अर्यः । गाः । अजति । यस्य । वष्टि । चोष्कूयमाणः । इन्द्र । भूरि । वामम् । मा । पणिः । भूः । अस्मत् । अधि । प्रवृद्ध॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अधिप्रवृद्ध) महोत्तमगुणयुक्त (इन्द्र) शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाले ! (सर्वसेनः) जिसके सब सेना (पणिः) सत्य व्यवहारी (चोष्कूयमाणः) सब शत्रुओं को भगानेवाले आप (भूरि) बहुत (इषुधीन्) जिसमें बाण रक्खे जाते हैं उसको धर के जैसे (अर्य्यः) वैश्य (गाः) पशुओं को (समजति) चलाता और खवाता है वैसे (न्यसक्त) शत्रुओं को दृढ़बन्धनों से बांध और (अस्मत्) हमसे (वामम्) अरुचिकार कर्म के कर्त्ता (मा भूः) मत हो जिससे (यस्य) आपका प्रताप (वष्टि) प्रकाशित हो और आप विजयी हों ॥३॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि जैसे वैश्य गौओं का पालन तथा चराकर दुग्धादिकों से व्यवहार सिद्ध करता है और जैसे ईश्वर से उत्पन्न हुए सब लोकों में बड़े सूर्यलोक की किरणें बाण के समान छेदन करनेवाली सब पदार्थों को प्रवेश करके वायु से ऊपर नीचे चला कर रस सहित सब पदार्थों करके सब सुख सिद्ध करते हैं इसके समान प्रजा का पालन करे ॥३॥
Subject
अब अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से शूरवीर के गुण प्रकाशित किये हैं।