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Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 13

191 Sukta
15 Mantra
1/33/13
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भि सि॒ध्मो अ॑जिगादस्य॒ शत्रू॒न्वि ति॒ग्मेन॑ वृष॒भेणा॒ पुरो॑ऽभेत् । सं वज्रे॑णासृजद्वृ॒त्रमिन्द्रः॒ प्र स्वां म॒तिम॑तिर॒च्छाश॑दानः ॥

अ॒भि । सि॒ध्मः । अ॒जि॒गा॒त् । अ॒स्य॒ । शत्रू॑न् । वि । ति॒ग्मेन॑ । वृ॒ष॒भेण॑ । पुरः॑ । अ॒भे॒त् । सम् । वज्रे॑ण । अ॒सृ॒ज॒त् । वृ॒त्रम् । इन्द्रः॑ । प्र । स्वाम् । म॒तिम् । अ॒ति॒र॒त् । शाश॑दानः ॥

Mantra without Swara
अभि सिध्मो अजिगादस्य शत्रून्वि तिग्मेन वृषभेणा पुरोऽभेत् । सं वज्रेणासृजद्वृत्रमिन्द्रः प्र स्वां मतिमतिरच्छाशदानः ॥

अभि । सिध्मः । अजिगात् । अस्य । शत्रून् । वि । तिग्मेन । वृषभेण । पुरः । अभेत् । सम् । वज्रेण । असृजत् । वृत्रम् । इन्द्रः । प्र । स्वाम् । मतिम् । अतिरत् । शाशदानः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 3

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Meaning
जैसे (अस्य) इस सूर्य का (सिध्मः) विजय प्राप्त करानेवाला वेग (तिग्मेन) तीक्ष्ण (वृषभेण) वृष्टि करनेवाले तेज से (शत्रून्) मेघ के अवयवों को (व्यजिगात्) प्राप्त होता और इस मेघ के (पुरः) नगरों के सदृश समुदायों को (व्यभेत्) भेदन करता है जैसे (शाशदानः) अत्यन्त छेदन करनेवाली (इन्द्रः) बिजुली (वृत्रम्) मेघ को (प्रातिरत्) अच्छे प्रकार नीचा करती है वैसे ही हम सेनाध्यक्ष को होना चाहिये ॥१३॥ (व्रजेण) तेज से समसृजत्) मिलाता है, तथा (स्वाम्) अपनी (मतिम्) ज्ञान से। इतना पाठ छूट गया है। सं०
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली मेघ के अवयव बद्दलों को तीक्ष्णवेग से छिन्न-भिन्न और भूमि में गेर कर उसको वश में करती है वैसे ही सभासेनाध्यक्ष को चाहिये कि बुद्धिशरीर बल वा सेना के वेग से शत्रुओं को छिन्न-भिन्न और शस्त्रों के अच्छे प्रकार प्रहार से पृथिवी पर गिरा कर अपनी सम्मति में लावें ॥१३॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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