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Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 12

191 Sukta
15 Mantra
1/33/12
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न्या॑विध्यदिली॒बिश॑स्य दृ॒ळ्हा वि शृ॒ङ्गिण॑मभिन॒च्छुष्ण॒मिन्द्रः॑ । याव॒त्तरो॑ मघव॒न्याव॒दोजो॒ वज्रे॑ण॒ शत्रु॑मवधीः पृत॒न्युम् ॥

नि । अ॒वि॒ध्य॒त् । इ॒ली॒बिश॑स्य । दृ॒ळ्हा । वि । शृ॒ङ्गिण॑म् । अ॒भि॒न॒त् । शुष्ण॑म् । इन्द्रः॑ । याव॑त् । तरः॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । याव॑त् । ओजः॑ । वज्रे॑ण । शत्रु॑म् । अ॒व॒धीः॒ । पृ॒त॒न्युम् ॥

Mantra without Swara
न्याविध्यदिलीबिशस्य दृळ्हा वि शृङ्गिणमभिनच्छुष्णमिन्द्रः । यावत्तरो मघवन्यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम् ॥

नि । अविध्यत् । इलीबिशस्य । दृळ्हा । वि । शृङ्गिणम् । अभिनत् । शुष्णम् । इन्द्रः । यावत् । तरः । मघवन् । यावत् । ओजः । वज्रेण । शत्रुम् । अवधीः । पृतन्युम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) अत्यन्त धनदाता महाधन युक्त वीर ! आप जैसे (इन्द्रः) बिजुली आदि बलयुक्त सूर्यलोक (इलीविशस्य) पृथिवी से गढ़ों में सोनेवाले मेघ के संबन्धी (दृळहा) दृढरूप बद्दलादिकों को (अभिनत्) छिन्न-भिन्न करते और अपना (यावत्) जितना (तरः) बल और (यावत्) जितना (ओजः) पराक्रम है उससे युक्त हुए (वज्रेण) किरण समूह से (शृंगिणम्) सींगों के समान ऊंचे (शुष्णम्) ऊपर चढ़ते हुए पदार्थों को सुखानेवाले मेघ को (न्यविध्यत्) नष्ट और (पृतन्युम्) सेना की इच्छा करते हुए (शत्रुं) शत्रु के समान मेघ का (अवधीः) हनन करता है वैसे शत्रुओं में चेष्टा किया करें ॥१२॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली मेघ के अवयवों को भिन्न-२ और जल को वर्षा कर सबको सुखयुक्त करती है वैसे ही सब मनुष्यों को उचित है कि उत्तम-२ शिक्षायुक्त सेना से दुष्टगुणवाले दुष्ट मनुष्यों को उपदेश दे और शस्त्र अस्त्र वृष्टि से शत्रुओं को निवारण कर प्रजा में सुखों की वृष्टि निरन्तर किया करें ॥१२॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में इन्द्र के कृत्य का उपदेश किया है।