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Rigveda Mandal 1 / Sukta 33 / Mantra 10

191 Sukta
15 Mantra
1/33/10
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न ये दि॒वः पृ॑थि॒व्या अन्त॑मा॒पुर्न मा॒याभि॑र्धन॒दां प॒र्यभू॑वन् । युजं॒ वज्रं॑ वृष॒भश्च॑क्र॒ इन्द्रो॒ निर्ज्योति॑षा॒ तम॑सो॒ गा अ॑दुक्षत् ॥

न । ये । दि॒वः । पृ॒थि॒व्याः । अन्त॑म् । आ॒पुः । न । मा॒याभिः॑ । ध॒न॒ऽदाम् । प॒रि॒ऽअभू॑वन् । युज॑म् । वज्र॑म् । वृ॒ष॒भः । च॒क्रे॒ । इन्द्रः॑ । निः । ज्योति॑षा । तम॑सः । गाः । अ॒धु॒क्ष॒त् ॥

Mantra without Swara
न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन् । युजं वज्रं वृषभश्चक्र इन्द्रो निर्ज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत् ॥

न । ये । दिवः । पृथिव्याः । अन्तम् । आपुः । न । मायाभिः । धनदाम् । परिअभूवन् । युजम् । वज्रम् । वृषभः । चक्रे । इन्द्रः । निः । ज्योतिषा । तमसः । गाः । अधुक्षत्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 3 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभा के स्वामी आप ! जैसे इस मेघ के (ये) जो बद्दलादि अवयव (दिवः) सूर्य के प्रकाश और (पृथिव्याः) अन्तरिक्ष की (अन्तम्) मर्यादा को (नापुः) नहीं प्राप्त होते (मायाभिः) अपनी गर्जना अंधकार और बिजली आदि माया मे (धनदाम्) पृथिवी का (न) (पर्यभूवन्) अच्छे प्रकार आच्छादन नहीं कर सकते हैं उन पर (वृषभः) वृष्टिकर्त्ता (इन्द्रः) छेदन करनेहारा सूर्य (युजं) प्रहार करने योग्य (वज्रम्) किरण समूह को फेंक के (ज्योतिषा) अपने तेज प्रकाश से (तमसः) अंधेर को (निश्चक्रे) निकाल देता और (गाः) पृथिवी लोकों को वर्षा से (अधुक्षत्) पूर्ण कर देता है वैसे जो शत्रुजन न्याय के प्रकाश और भूमि के राज्य के अन्त को न पावें धन देनेवाली राजनीति का नाश न कर सकें उन वैरियों पर अपनी प्रभुता विद्यादान से अविद्या की निवृत्ति और प्रजा को सुखों से पूर्ण किया कीजिये ॥१०॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सूर्य के तेजरूप स्वभाव और प्रकाश के सदृश कर्म कर और सब शत्रुओं के अन्यायरूप अंधकार का नाश करके धर्म से राज्य का सेवन करें। क्योंकि छली कपटी लोगों का राज्य स्थिर कभी नहीं होता इससे सबको छलादि दोष रहित विद्वान् होके शत्रुओं की माया में न फँस के राज्य का पालन करने के लिये अवश्य उद्योग करना चाहिये ॥१०॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में इन्द्र के कर्मों का उपदेश किया है।