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Rigveda Mandal 1 / Sukta 32 / Mantra 8

191 Sukta
15 Mantra
1/32/8
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न॒दं न भि॒न्नम॑मु॒या शया॑नं॒ मनो॒ रुहा॑णा॒ अति॑ य॒न्त्यापः॑ । याश्चि॑द्वृ॒त्रो म॑हि॒ना प॒र्यति॑ष्ठ॒त्तासा॒महिः॑ पत्सुतः॒शीर्ब॑भूव ॥

न॒दम् । न । भि॒न्नम् । अ॒मु॒या । शया॑नम् । मनः॑ । रुहा॑णाः । अति॑ । य॒न्ति॒ । आपः॑ । याः । चि॒त् । वृ॒त्रः । म॒हि॒ना । प॒रि॒ऽअति॑ष्ठत् । तासा॑म् । अहिः॑ । प॒त्सु॒तः॒शीः । ब॒भू॒व॒ ॥

Mantra without Swara
नदं न भिन्नममुया शयानं मनो रुहाणा अति यन्त्यापः । याश्चिद्वृत्रो महिना पर्यतिष्ठत्तासामहिः पत्सुतःशीर्बभूव ॥

नदम् । न । भिन्नम् । अमुया । शयानम् । मनः । रुहाणाः । अति । यन्ति । आपः । याः । चित् । वृत्रः । महिना । परिअतिष्ठत् । तासाम् । अहिः । पत्सुतःशीः । बभूव॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 37 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
भो राजाधिराज आप जैसे यह (वृत्रः) मेघ (महिना) अपनी महिमा से (पर्यतिष्ठत्) सब ओर से एकता को प्राप्त और (अहिः) सूर्य के ताप से मारा हुआ (तासाम्) उन जलों के बीच में स्थित (पत्सुतःशीः) पादों के तले सोनेवाला सा (बभूव) होता है उस मेघ का शरीर (मनः) मननशील अन्तःकरण के सदृश (रुहाणाः) उत्पन्न होकर चलनेवाली नदी जो अन्तरिक्ष में रहनेवाले (चित्) ही (याः) जल (भिन्नम्) विदीर्ण तटवाले (शयानं) सोते हुए के (न) तुल्य (नदम्) महाप्रवाहयुक्त नद को (यन्ति) जाते और वे जल (न) (अमुया) इस पृथिवी के साथ प्राप्त होते हैं वैसे सब शत्रुओं को बाँध के वश में कीजिये ॥८॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमालङ्कार हैं। जितना जल सूर्य से छिन्न-भिन्न होकर पवन के साथ मेघमण्डल को जाता है वह सब जल मेघरूप ही हो जाता है जब मेघ के जल का समूह अत्यन्त बढ़ता है तब मेघ घनी-२ घटाओं से घुमड़ि-२ के सूर्य के प्रकाश को ढांप लेता है उसको सूर्य अपनी किरणों से जब छिन्न-भिन्न करता है तब इधर-उधर आए हुए जल बड़े-२ नद ताल और समुद्र आदि स्थानों को प्राप्त होकर सोते हैं वह मेघ भी पृथिवी को प्राप्त होकर जहां तहां सोता है अर्थात् मनुष्य आदि प्राणियों के पैरों में सोता सा मालूम होता है वैसे अधार्मिक मनुष्य भी प्रथम बढ़ के शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥८॥
Subject
फिर वे दोनों परस्पर क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।