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Rigveda Mandal 1 / Sukta 32 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/32/7
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒पाद॑ह॒स्तो अ॑पृतन्य॒दिन्द्र॒मास्य॒ वज्र॒मधि॒ सानौ॑ जघान । वृष्णो॒ वध्रिः॑ प्रति॒मानं॒ बुभू॑षन्पुरु॒त्रा वृ॒त्रो अ॑शय॒द्व्य॑स्तः ॥

अ॒पात् । अ॒ह॒स्तः । अ॒पृ॒त॒न्य॒त् । इन्द्र॑म् । आ । अ॒स्य॒ । वज्र॑म् । अधि॑ । सानौ॑ । ज॒घा॒न॒ । वृष्णः॑ । वध्रिः॑ । प्र॒ति॒ऽमान॑म् । बुभू॑षन् । पु॒रु॒ऽत्रा । वृ॒त्रः । अ॒श॒य॒त् । विऽअ॑स्तः ॥

Mantra without Swara
अपादहस्तो अपृतन्यदिन्द्रमास्य वज्रमधि सानौ जघान । वृष्णो वध्रिः प्रतिमानं बुभूषन्पुरुत्रा वृत्रो अशयद्व्यस्तः ॥

अपात् । अहस्तः । अपृतन्यत् । इन्द्रम् । आ । अस्य । वज्रम् । अधि । सानौ । जघान । वृष्णः । वध्रिः । प्रतिमानम् । बुभूषन् । पुरुत्रा । वृत्रः । अशयत् । विअस्तः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 37 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे सब सेनाओं के स्वामी ! आप (वृत्रः) जैसे मेघ (वृष्णः) वीर्य सींचनेवाले पुरुष की (प्रतिमानम्) समानता को (बुभूषन्) चाहते हुए (बध्रिः) निर्बल नपुंसक के समान जिस (इन्द्रम्) सूर्यलोक के प्रति (अपृतन्यत्) युद्ध के लिये इच्छा करनेवाले के समान (अस्य) इस मेघ के (सानौ) (अधि) पर्वत के शिखरों के समान बद्दलों पर सूर्य्यलोक (वज्रम्) अपने किरण रूपी वज्र को (आजघान) छोड़ता है उस से मरा हुआ मेघ (अपादहस्तः) पैर हांथ कटे हुए मनुष्य के तुल्य (व्यस्तः) अनेक प्रकार फैला पड़ा हुआ (पुरुत्रा) अनेक स्थानों में (अशयत्) सोता सा मालूम देता है वैसे इस प्रकार के शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर सदा जीता कीजिये ॥७॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे कोई निर्बल पुरुष बड़े बलवान् के साथ युद्ध चाहें वैसे ही वृत्र मेघ सूर्य के साथ प्रवृत्त होता है और जैसे अन्त में वह मेघ सूर्य से छिन्न-भिन्न होकर पराजित हुए के समान पृथिवी पर गिर पड़ता है वैसे जो धर्मात्मा बलवान् पुरुष के सङ्ग लड़ाई को प्रवृत्त होता है उसकी भी ऐसी ही दशा होती है ॥७॥
Subject
फिर वह मेघ कैसा होकर पृथिवी पर गिरता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।