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Rigveda Mandal 1 / Sukta 32 / Mantra 3

191 Sukta
15 Mantra
1/32/3
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वृ॒षा॒यमा॑णोऽवृणीत॒ सोमं॒ त्रिक॑द्रुकेष्वपिबत्सु॒तस्य॑ । आ साय॑कं म॒घवा॑दत्त॒ वज्र॒मह॑न्नेनं प्रथम॒जा मही॑नाम् ॥

वृ॒ष॒ऽयमा॑णः । अ॒वृ॒णी॒त॒ । सोम॑म् । त्रिऽक॑द्रुकेषु । अ॒पि॒ब॒त् । सु॒तस्य॑ । आ । साय॑कम् । म॒घवा॑ । अ॒द॒त्त॒ । वज्र॑म् । अह॑न् । ए॒न॒म् । प्र॒थ॒म॒ऽजाम् । अही॑नाम् ॥

Mantra without Swara
वृषायमाणोऽवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत्सुतस्य । आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजा महीनाम् ॥

वृषयमाणः । अवृणीत । सोमम् । त्रिकद्रुकेषु । अपिबत् । सुतस्य । आ । सायकम् । मघवा । अदत्त । वज्रम् । अहन् । एनम् । प्रथमजाम् । अहीनाम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 36 Mantra » 3

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Meaning
जो (वृषायमाणः) वीर्य्यवृद्धि का आचरण करता हुआ सूर्य्यलोक मेघ के समान (सुतस्य) इस उत्पन्न हुए जगत् के (त्रिकद्रुकेषु) जिनकी उत्पत्ति स्थिरता और विनाश ये तीन कला व्यवहार में वर्त्तानेवाले हैं उन पदार्थों में (सोमम्) उत्पन्न हुए रस को (अवृणीत) स्वीकार करता (अपिबत्) उसको अपने ताप में भर लेता और (मघवा) यह बहुत सा धन दिलानेवाला सूर्य (सायकम्) शस्त्ररूप (वज्रम्) किरण समूह को (आदत्त) लेते हुए के समान (अहीनाम्) मेघों में (प्रथमजाम्) प्रथम प्रगट हुए (एनम्) इस मेघ को (अहन्) मारता है। वैसे गुण, कर्म, स्वभाव युक्त पुरुष सेनापति का अधिकार पाने योग्य होता है ॥३॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे बैल वीर्य को बढ़ा बलवान् हो सुखी होता है वैसे सेनापति दूध आदि पीकर बलवान् हो के सुखी होवे और जैसे सूर्य्य रस को पी अच्छे प्रकार वरसाता है वैसै शत्रुओं के बल कों खींच अपना बल बढ़ा के प्रजा में सुखों की वृष्टि करे ॥३॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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