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Rigveda Mandal 1 / Sukta 32 / Mantra 2

191 Sukta
15 Mantra
1/32/2
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अह॒न्नहिं॒ पर्व॑ते शिश्रिया॒णं त्वष्टा॑स्मै॒ वज्रं॑ स्व॒र्यं॑ ततक्ष । वा॒श्रा इ॑व धे॒नवः॒ स्यन्द॑माना॒ अञ्जः॑ समु॒द्रमव॑ जग्मु॒रापः॑ ॥

अह॑न् । अहि॑म् । पर्व॑ते । शि॒श्रि॒या॒णम् । त्वष्टा॑ । अ॒स्मै॒ । वज्र॑म् । स्व॒र्य॑म् । त॒त॒क्ष॒ । वा॒श्राःऽइ॑व । धे॒नवः॑ । स्यन्द॑मानाः । अञ्जः॑ । स॒मु॒द्रम् । अव॑ । ज॒ग्मुः॒ । आपः॑ ॥

Mantra without Swara
अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष । वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः ॥

अहन् । अहिम् । पर्वते । शिश्रियाणम् । त्वष्टा । अस्मै । वज्रम् । स्वर्यम् । ततक्ष । वाश्राःइव । धेनवः । स्यन्दमानाः । अञ्जः । समुद्रम् । अव । जग्मुः । आपः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 36 Mantra » 2

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Meaning
जैसे यह (त्वष्टा) सूर्य्यलोक (पर्वते) मेघमण्डल में (शिश्रियाणम्) रहनेवाले (स्वर्य्यम्) गर्जनशील (अहिम्) मेघ को (अहन्) मारता है (अस्मै) इस मेघ के लिये (वज्रम्) काटने के स्वभाववाले किरणों को (ततक्ष) छोड़ता है। इस कर्म से (वाश्रा धेनव इव) बछरो को प्रीतिपूर्वक वा चाहती हुई गौओं के समान (स्यन्दमानाः) चलते हुए (अंजः) प्रकट (आपः) जल (समुद्रम्) जल से पूर्ण समुद्र को (अवजग्मुः) नदियों के द्वारा जाते हैं। वैसे ही सभाध्यक्ष राजा को चाहिये कि किला में रहनेवाले दुष्ट शत्रु को मारे इस शत्रु के लिये उत्तम शस्त्र छोड़े इस प्रकार उसके बछरों को चाहनेवाली गौओं के समान चलते हुए प्रसिद्ध प्राणों को अन्तरिक्ष में प्राप्त करे उन कण्टक शत्रुओं को मार के प्रजा को सुख देवे ॥२॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपनी किरणों से अन्तरिक्ष में रहनेवाले मेघ को भूमि पर गिराकर जगत् को जिआता है वैसे ही सेनापति किला पर्वत आदि में रहनेवाले भी शत्रु को पृथिवी में गिरा के प्रजा को निरन्तर सुखी करता है ॥२॥
Subject
फिर वह सूर्य्य तथा सभापति क्या करता है। इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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