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Rigveda Mandal 1 / Sukta 32 / Mantra 13

191 Sukta
15 Mantra
1/32/13
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नास्मै॑ वि॒द्युन्न त॑न्य॒तुः सि॑षेध॒ न यां मिह॒मकि॑रद्ध्रा॒दुनिं॑ च । इन्द्र॑श्च॒ यद्यु॑यु॒धाते॒ अहि॑श्चो॒ताप॒रीभ्यो॑ म॒घवा॒ वि जि॑ग्ये ॥

न । अ॒स्मै॒ । वि॒द्युत् । न । त॒न्य॒तुः । सि॒से॒ध॒ । न । याम् । मिह॑म् । अकि॑रत् । ह्रा॒दुनि॑म् । च॒ । इन्द्रः॑ । च॒ । यत् । यु॒यु॒धाते॒ इति॑ । अहिः॑ । च॒ । उ॒त । अ॒प॒रीभ्यः॑ । म॒घऽवा॑ । वि । जि॒ग्ये॒ ॥

Mantra without Swara
नास्मै विद्युन्न तन्यतुः सिषेध न यां मिहमकिरद्ध्रादुनिं च । इन्द्रश्च यद्युयुधाते अहिश्चोतापरीभ्यो मघवा वि जिग्ये ॥

न । अस्मै । विद्युत् । न । तन्यतुः । सिसेध । न । याम् । मिहम् । अकिरत् । ह्रादुनिम् । च । इन्द्रः । च । यत् । युयुधाते इति । अहिः । च । उत । अपरीभ्यः । मघवा । वि । जिग्ये॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 38 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे सेनापते ! आप जैसे मेघ ने (अस्मै) इस सूर्य लोक के लिये छोड़ी हुई (विद्युत्) बिजुली (न) (सिषेध) इसकी कुछ रुकावट नहीं कर सकती (तन्यतुः) उस मेघ की गर्जना भी उस सूर्य को (न) (सिषेध) नहीं रोक सकती और वह (अहिः) मेघ (याम्) जिस (ह्रादुनिम्) गर्जना आदि गुणवाली (मिहम्) वरसा को (च) भी (अकिरत्) छोड़ता है वह भी सूर्य की (न) (सिषेध) हानि नहीं कर सकती है यह (इन्द्रः) सूर्यलोक अपनी किरणरूपी पूर्णसेना से युक्त (उत) और अपनी (अपरीभ्यः) अधूरी सेना से युक्त (अहिः) मेघ (च) भी ये दोनों (युयुधाते) परस्पर युद्ध किया करते हैं (यत्) अधिकबलयुक्त होने के कारण (मघवा) अत्यन्त प्रकाशवान् सूर्यलोक उस मेघ को (च) भी (विजिग्ये) अच्छे प्रकार जीत लेता है वैसे ही धर्मयुक्त पूर्णबल करके शत्रुओं का विजय कीजिये ॥१३॥
Essence
इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को योग्य है कि जैसे वृत्र अर्थात् मेघ के जितने बिजली आदि युद्ध के साधन हैं वे सब सूर्य के आगे क्षुद्र अर्थात् सब प्रकार निर्बल और थोड़े हैं और सूर्य के युद्धसाधन उसकी अपेक्षा से बड़े-२ हैं इसीसे सब समय में सूर्य ही का विजय और मेघ का पराजय होता रहता है वैसे ही धर्म से शत्रुओं को जीतें ॥१३॥
Subject
इन दोनों के इस युद्ध में किस का विजय होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।