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Rigveda Mandal 1 / Sukta 32 / Mantra 12

191 Sukta
15 Mantra
1/32/12
Devata- इन्द्र: Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अश्व्यो॒ वारो॑ अभव॒स्तदि॑न्द्र सृ॒के यत्त्वा॑ प्र॒त्यह॑न्दे॒व एकः॑ । अज॑यो॒ गा अज॑यः शूर॒ सोम॒मवा॑सृजः॒ सर्त॑वे स॒प्त सिन्धू॑न् ॥

अश्व्यः॑ । वारः॑ । अ॒भ॒वः॒ । तत् । इ॒न्द्र॒ । सृ॒के । यत् । त्वा॒ । प्र॒ति॒ऽअह॑न् । दे॒वः । एकः॑ । अज॑यः । गाः । अज॑यः । शू॒र॒ । सोम॑म् । अव॑ । अ॒सृ॒जः॒ । सर्त॑वे । स॒प्त । सिन्धू॑न् ॥

Mantra without Swara
अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन्देव एकः । अजयो गा अजयः शूर सोममवासृजः सर्तवे सप्त सिन्धून् ॥

अश्व्यः । वारः । अभवः । तत् । इन्द्र । सृके । यत् । त्वा । प्रतिअहन् । देवः । एकः । अजयः । गाः । अजयः । शूर । सोमम् । अव । असृजः । सर्तवे । सप्त । सिन्धून्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 38 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) वीर के तुल्य भयरहित (इन्द्र) शत्रुओं को विदीर्ण करनेहारे सेना के स्वामी ! आप जैसे (यत्) जो (अश्व्यः) वेग और तड़फ आदि गुणों में निपुण (वारः) स्वीकार करने योग्य (एकः) असहाय और (देवः) उत्तम-२ गुण देनेवाला मेघ सूर्य के साथ युद्ध करनेहारा (अभवः) होता है (सृके) किरणरूपी वज्र में अपने बद्दलों के जाल को (प्रत्यहन्) छोड़ता है अर्थात् किरणों को उस घन जाल से रोकता है सूर्य्य उस मेघ को जीतकर (गाः) उससे अपनी किरणों को (अजयः) अलग करता अर्थात् एक देश से दूसरे देश में पहुंचाता और (सोमम्) पदार्थों के रस को (अजयः) जीतता है इस प्रकार करता हुआ वह सूर्यलोक जलों को (सर्त्तवे) ऊपर-नीचे जाने-आने के लिये सब लोकों में स्थिर होनेवाले (सप्त) (सिन्धून्) बड़े-२ जलाशय, नदी, कुंआ, और साधरण तालाब ये चार जल के स्थान पृथिवी पर और समीप, बीच, और दूरदेश में रहनेवाले तीन जलाशय इन सात जलाशयों को (अवासृजः) उत्पन्न करता है वैसे शत्रुओं में चेष्टा करते हो (तत्) इसी कारण (त्वा) आपको युद्धो में हम लोग अधिष्ठाता करते हैं ॥१२॥
Essence
इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे यह मेघ सूर्य के प्रकाश को ढांप देता तब वह सूर्य अपनी किरणों से उसको छिन्न-भिन्न कर भूमि में जल को वर्षाता है इसीसे यह सूर्य उस जल समुदाय को पहुंचाने न पहुंचाने के लिये समुद्रों को रचने का हेतु होता है वैसे प्रजा का रक्षक राजा शत्रुओं को बांध शस्त्रों से काट और नीच गति को प्राप्त करके प्रजा को धर्मयुक्त मार्ग में चलाने का निमित्त होवे ॥१२॥
Subject
फिर वे दोनों परस्पर क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।