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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 9

191 Sukta
18 Mantra
1/31/9
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वं नो॑ अग्ने पि॒त्रोरु॒पस्थ॒ आ दे॒वो दे॒वेष्व॑नवद्य॒ जागृ॑विः। त॒नू॒कृद्बो॑धि॒ प्रम॑तिश्च का॒रवे॒ त्वं क॑ल्याण॒ वसु॒ विश्व॒मोपि॑षे ॥

त्वम् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । पि॒त्रोः । उ॒पऽस्थे॑ । आ । दे॒वः । दे॒वेषु॑ । अ॒न॒व॒द्य॒ । जागृ॑विः । त॒नू॒ऽकृत् । बो॒धि॒ । प्रऽम॑तिः । च॒ । का॒रवे॑ । त्वम् । क॒ल्या॒ण॒ । वसु॑ । विश्व॑म् । आ । ऊ॒पि॒षे॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं नो अग्ने पित्रोरुपस्थ आ देवो देवेष्वनवद्य जागृविः। तनूकृद्बोधि प्रमतिश्च कारवे त्वं कल्याण वसु विश्वमोपिषे ॥

त्वम्। नः। अग्ने। पित्रोः। उपऽस्थे। आ। देवः। देवेषु। अनवद्य। जागृविः। तनूऽकृत्। बोधि। प्रऽमतिः। च। कारवे। त्वम्। कल्याण। वसु। विश्वम्। आ। ऊपिषे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 33 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अनवद्य) उत्तम कर्मयुक्त (अग्ने) सब पदार्थों के जाननेवाले सभापते ! (जागृविः) धर्मयुक्त पुरुषार्थ में जागने (देवः) सब प्रकाश करने (तनूकृत्) और बड़े-बड़े पृथिवी आदि बड़े लोकों में ठहरने हारे आप (देवेषु) विद्वान् वा अग्नि आदि तेजस्वी दिव्य गुणयुक्त लोकों में (पित्रोः) माता-पिता के (उपस्थे) समीपस्थ व्यवहार में (नः) हम लोगों को (ऊपिषे) वार-वार नियुक्त कीजिये। (कल्याण) हे अत्यन्त सुख देनेवाले राजन् ! (प्रमतिः) उत्तम ज्ञान देते हुए आप (कारवे) कारीगरी के चाहनेवाले मुझ को (वसु) विद्या, चक्रवर्त्ति राज्य आदि पदार्थों से सिद्ध होनेवाले (विश्वम्) समस्त धन का (आबोधि) अच्छे प्रकार बोध कराइये ॥ ९ ॥
Essence
फिर भी ईश्वर की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये कि हे भगवन् ! जब-जब आप जन्म दें, तब-तब श्रेष्ठ विद्वानों के सम्बन्ध में जन्म दें और वहाँ हम लोगों को सर्व विद्यायुक्त कीजिये, जिससे हम लोग सब धनों को प्राप्त होकर सदा सुखी हों ॥ ९ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥