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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 8

191 Sukta
18 Mantra
1/31/8
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं नो॑ अग्ने स॒नये॒ धना॑नां य॒शसं॑ का॒रुं कृ॑णुहि॒ स्तवा॑नः। ऋ॒ध्याम॒ कर्मा॒पसा॒ नवे॑न दे॒वैर्द्या॑वापृथिवी॒ प्राव॑तं नः ॥

त्वम् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । स॒नये॑ । धना॑नाम् । य॒शस॑म् । का॒रुम् । कृ॒णु॒हि॒ । स्तवा॑नः । ऋ॒ध्याम॑ । कर्म॑ । अ॒पसा॑ । नवे॑न । दे॒वैः । द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । प्र । अ॒व॒त॒म् । नः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं नो अग्ने सनये धनानां यशसं कारुं कृणुहि स्तवानः। ऋध्याम कर्मापसा नवेन देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः ॥

त्वम्। नः। अग्ने। सनये। धनानाम्। यशसम्। कारुम्। कृणुहि। स्तवानः। ऋध्याम। कर्म। अपसा। नवेन। देवैः। द्यावापृथिवी इति। प्र। अवतम्। नः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 33 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) कीर्त्ति और उत्साह के प्राप्त करानेवाले जगदीश्वर वा परमेश्वरोपासक ! (स्तवानः) आप स्तुति को प्राप्त होते हुए (नः) हम लोगों के (धनानाम्) विद्या सुवर्ण चक्रवर्त्ति राज्य प्रसिद्ध धनों के (सनये) यथायोग्य कार्य्यों में व्यय करने के लिये (यशसम्) कीर्त्तियुक्त (कारुम्) उत्साह से उत्तम कर्म करनेवाले उद्योगी मनुष्य को नियुक्त (कृणुहि) कीजिये, जिससे हम लोग नवीन (अपसा) पुरुषार्थ से (नित्य) नित्य बुद्धियुक्त होते रहें और आप दोनों विद्या की प्राप्ति के लिये (देवैः) विद्वानों के साथ करते हुए (नः) हम लोगों की और (द्यावापृथिवी) सूर्य प्रकाश और भूमि को (प्रावतम्) रक्षा कीजिये ॥ ८ ॥
Essence
मनुष्यों को परमेश्वर की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमेश्वर ! आप कृपा करके हम लोगों में उत्तम धन देनेवाली सब शिल्पविद्या के जाननेवाले उत्तम विद्वानों को सिद्ध कीजिये, जिससे हम लोग उनके साथ नवीन-नवीन पुरुषार्थ करके पृथिवी के राज्य और सब पदार्थों से यथायोग्य उपकार ग्रहण करें ॥ ८ ॥
Subject
फिर परमात्मा का उपासक प्रजा के वास्ते कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥