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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 7

191 Sukta
18 Mantra
1/31/7
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वं तम॑ग्ने अमृत॒त्व उ॑त्त॒मे मर्तं॑ दधासि॒ श्रव॑से दि॒वेदि॑वे। यस्ता॑तृषा॒ण उ॒भया॑य॒ जन्म॑ने॒ मयः॑ कृ॒णोषि॒ प्रय॒ आ च॑ सू॒रये॑ ॥

त्वम् । तम् । अ॒ग्ने॒ । अ॒मृ॒त॒ऽत्वे । उ॒त्ऽत॒मे । मर्त॑म् । द॒धा॒सि॒ । श्रव॑से । दि॒वेऽदि॑वे । यः । त॒तृ॒षा॒णः । उ॒भया॑य । जन्म॑ने । मयः॑ । कृ॒णोषि॑ । प्रयः॑ । आ । च॒ । सू॒रये॑ ॥

Mantra without Swara
त्वं तमग्ने अमृतत्व उत्तमे मर्तं दधासि श्रवसे दिवेदिवे। यस्तातृषाण उभयाय जन्मने मयः कृणोषि प्रय आ च सूरये ॥

त्वम्। तम्। अग्ने। अमृतऽत्वे। उत्ऽतमे। मर्तम्। दधासि। श्रवसे। दिवेऽदिवे। यः। ततृषाणः। उभयाय। जन्मने। मयः। कृणोषि। प्रयः। आ। च। सूरये ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 33 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) जगदीश्वर ! आप (यः) जो (सूरिः) बुद्धिमान् मनुष्य (दिवेदिवे) प्रतिदिन (श्रवसे) सुनने के योग्य अपने लिये मोक्ष को चाहता है, उस (मर्त्तम्) मनुष्य को (उत्तमे) अत्युत्तम (अमृतत्वे) मोक्षपद में स्थापन करते हो और जो बुद्धिमान् अत्यन्त सुख भोग कर फिर (उभयाय) पूर्व और पर (जन्मने) जन्म के लिये चाहना करता हुआ उस मोक्षपद से निवृत्त होता है, उस (सूरये) बुद्धिमान् सज्जन के लिये (मयः) सुख और (प्रयः) प्रसन्नता को (आ कृणोषि) सिद्ध करते हो ॥ ७ ॥
Essence
जो ज्ञानी धर्मात्मा मनुष्य मोक्षपद को प्राप्त होते हैं, उनका उस समय ईश्वर ही आधार है, जो जन्म हो गया वह पहिला और जो मृत्यु वा मोक्ष होके होगा वह दूसरा, जो है वह तीसरा और जो विद्या वा आचार्य से होता है वह चौथा जन्म है। ये चार जन्म मिल के जो मोक्ष के पश्चात् होता है वह दूसरा जन्म है। इन दोनों जन्मों के धारण करने के लिये सब जीव प्रवृत्त हो रहे हैं। मोक्षपद से छूट कर संसार की प्राप्ति होती है, यह भी व्यवस्था ईश्वर के आधीन है ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह ईश्वर जीवों के लिये क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥