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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 6

191 Sukta
18 Mantra
1/31/6
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने वृजि॒नव॑र्तनिं॒ नरं॒ सक्म॑न्पिपर्षि वि॒दथे॑ विचर्षणे। यः शूर॑साता॒ परि॑तक्म्ये॒ धने॑ द॒भ्रेभि॑श्चि॒त्समृ॑ता॒ हंसि॒ भूय॑सः ॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । वृ॒जि॒नऽव॑र्तनिम् । नर॑म् । सक्म॑न् । पि॒प॒र्षि॒ । वि॒दथे॑ । वि॒ऽच॒र्ष॒णे॒ । यः । शूर॑ऽसाता । परि॑ऽतक्म्ये । धने॑ । द॒भ्रेभिः॑ । चि॒त् । सम्ऽऋ॑ता । हंसि॑ । भूय॑सः ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने वृजिनवर्तनिं नरं सक्मन्पिपर्षि विदथे विचर्षणे। यः शूरसाता परितक्म्ये धने दभ्रेभिश्चित्समृता हंसि भूयसः ॥

त्वम्। अग्ने। वृजिनऽवर्तनिम्। नरम्। सक्मन्। पिपर्षि। विदथे। विऽचर्षणे। यः। शूरऽसाता। परिऽतक्म्ये। धने। दभ्रेभिः। चित्। सम्ऽऋता। हंसि। भूयसः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 33 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (सक्मन्) सब पदार्थों का सम्बन्ध कराने (विचर्षणे) अनेक प्रकार के पदार्थों को अच्छे प्रकार देखनेवाले (अग्ने) राजनीतिविद्या से शोभायमान सेनापति ! (यः) जो तू (विदथे) धर्मयुक्त यज्ञरूपी (शूरसातौ) संग्राम में (दभ्रेभिः) थोड़े ही साधनों से (वृजिनवर्त्तनिम्) अधर्म मार्ग में चलनेवाले (नरम्) मनुष्य और (भूयसः) बहुत शत्रुओं का (हंसि) हननकर्त्ता है और (समृता) अच्छे प्रकार सत्य कर्मों का (पिपर्षि) पालनकर्त्ता है, सो आप चोरों द्वारा पराये पदार्थों के हरने की इच्छा से (परितक्म्ये) सब ओर से देखने योग्य (धने) सुवर्ण विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य आदि धन की रक्षा करने के निमित्त हमारे सेनापति हूजिये ॥ ६ ॥
Essence
परमेश्वर का यह स्वभाव है कि जो पुरुष अधर्म छोड़ धर्म करने की इच्छा करते हैं, उनको अपनी कृपा से शीघ्र ही धर्म में स्थिर करता है, जो धर्म से युद्ध वा धन को सिद्ध कराना चाहते हैं, उनकी रक्षा कर उनके कर्मों के अनुसार उनके लिये धन देता और जो खोटे आचरण करते हैं, उनको उनके कर्मों के अनुसार दण्ड देता है, जो ईश्वर की आज्ञा में वर्त्तमान धर्मात्मा थोड़े भी युद्ध के पदार्थों से युद्ध करने को प्रवृत्त होते हैं, ईश्वर उन्हीं को विजय देता है, औरों को नहीं ॥ ६ ॥
Subject
अब ईश्वर का उपासक वा प्रजा पालनेहारा पुरुष क्या-क्या कृत्य करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥