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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 5

191 Sukta
18 Mantra
1/31/5
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने वृष॒भः पु॑ष्टि॒वर्ध॑न॒ उद्य॑तस्रुचे भवसि श्र॒वाय्यः॑। य आहु॑तिं॒ परि॒ वेदा॒ वष॑ट्कृति॒मेका॑यु॒रग्रे॒ विश॑ आ॒विवा॑ससि ॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । वृ॒ष॒भः । पु॑ष्टि॒ऽवर्ध॑नः । उद्य॑तऽस्रुचे । भ॒व॒सि॒ । श्र॒वाय्यः॑ । यः । आऽहु॑तिम् । परि॑ । वेद॑ । वष॑ट्ऽकृतिम् । एक॑ऽआयुः । अग्ने॑ । विशः॑ । आ॒ऽविवा॑ससि ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने वृषभः पुष्टिवर्धन उद्यतस्रुचे भवसि श्रवाय्यः। य आहुतिं परि वेदा वषट्कृतिमेकायुरग्रे विश आविवाससि ॥

त्वम्। अग्ने। वृषभः। पुष्टिऽवर्धनः। उद्यतऽस्रुचे। भवसि। श्रवाय्यः। यः। आऽहुतिम्। परि। वेद। वषट्ऽकृतिम्। एकऽआयुः। अग्ने। विशः। आऽविवाससि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 32 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) यज्ञक्रियाफलवित् जगद्गुरो परेश ! जो (त्वम्) आप (अग्रे) प्रथम (उद्यतस्रुचे) स्रुक् अर्थात् होम कराने के पात्र को अच्छे प्रकार ग्रहण करनेवाले मनुष्य के लिये (श्रवाय्यः) सुनने-सुनाने योग्य (वृषभः) और सुख वर्षानेवाले (एकायुः) एक सत्य गुण, कर्म, स्वभाव रूप समान युक्त तथा (पुष्टिवर्द्धनः) पुष्टि वृद्धि करनेवाले (भवसि) होते हैं और (यः) जो आप (वषट्कृतिम्) जिसमें कि उत्तम-उत्तम क्रिया की जायें (आहुतिम्) तथा जिससे धर्मयुक्त आचरण किये जायें, उसका विज्ञान कराते हैं (विशः) प्रजा लोग पुष्टि वृद्धि के साथ उन आप और सुखों को (पर्याविवासति) अच्छे प्रकार से सेवन करते हैं ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि पहिले जगत् का कारण ब्रह्मज्ञान और यज्ञ की विद्या में जो क्रिया जिस-जिस प्रकार के होम करने योग्य पदार्थ हैं, उनको अच्छे प्रकार जानकर उनकी यथायोग्य क्रिया जानने से शुद्ध वायु और वर्षा जल की शुद्धि के निमित्त जो पदार्थ हैं, उनका होम अग्नि में करने से इस जगत् में बड़े-बड़े उत्तम-उत्तम सुख बढ़ते हैं और उनसे सब प्रजा आनन्दयुक्त होती है ॥ ५ ॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में उसी का प्रकाश किया है ॥