Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 3

191 Sukta
18 Mantra
1/31/3
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो मा॑त॒रिश्व॑न आ॒विर्भ॑व सुक्रतू॒या वि॒वस्व॑ते। अरे॑जेतां॒ रोद॑सी होतृ॒वूर्येऽस॑घ्नोर्भा॒रमय॑जो म॒हो व॑सो ॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । प्र॒थ॒मः । मा॒त॒रिश्व॑ने । आ॒विः । भ॒व॒ । सु॒क्र॒तू॒ऽया । वि॒वस्व॑ते । अरे॑जेताम् । रोद॑सी॒ इति॑ । हो॒तृ॒ऽवूर्ये॑ । अस॑घ्नोः । भा॒रम् । अय॑जः । म॒हः । व॒सो॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने प्रथमो मातरिश्वन आविर्भव सुक्रतूया विवस्वते। अरेजेतां रोदसी होतृवूर्येऽसघ्नोर्भारमयजो महो वसो ॥

त्वम्। अग्ने। प्रथमः। मातरिश्वने। आविः। भव। सुक्रतूऽया। विवस्वते। अरेजेताम्। रोदसी इति। होतृऽवूर्ये। असघ्नोः। भारम्। अयजः। महः। वसो इति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 32 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) परमात्मन् वा विद्वन् ! (प्रथमः) अनादिस्वरूप वा समस्त कार्यों में अग्रगन्ता (त्वम्) आप जिस (सुक्रतूया) श्रेष्ठ बुद्धि और कर्मों को सिद्ध करानेवाले पवन से (होतृवूर्ये) होताओं को ग्रहण करने योग्य (रोदसी) विद्युत् और पृथिवी (अरेजेताम्) अपनी कक्षा में घूमा करते हैं, उस (मातरिश्वने) अपनी आकाश रूपी माता में सोनेवाले पवन वा (विवस्वते) सूर्यलोक के लिये उनको (आविः भव) प्रकट कराइये । हे (वसो) सबको निवास करानेहारे ! आप शत्रुओं का (असघ्नोः) विनाश कीजिये, जिनसे (महः) बड़े-बड़े (भारम्) भारयुक्त यान को (अयजः) देश-देशान्तर में पहुँचाते हो, उनका बोध हमको कराइये ॥ ३ ॥
Essence
कारणरूप अग्नि अपने कारण और वायु के निमित्त से सूर्य रूप से प्रसिद्ध तथा अन्धकार विनाश करके पृथिवी वा प्रकाश का धारण करता है, वह यज्ञ वा शिल्पविद्या के निमित्त से कलायन्त्रों में संयुक्त किया हुआ बड़े-बड़े भारयुक्त विमान आदि यानों को शीघ्र ही देश-देशान्तर में पहुँचाता है ॥ ३ ॥
Subject
फिर वे दोनों कैसे हैं, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥