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Rigveda Mandal 1 / Sukta 31 / Mantra 2

191 Sukta
18 Mantra
1/31/2
Devata- अग्निः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो अङ्गि॑रस्तमः क॒विर्दे॒वानां॒ परि॑ भूषसि व्र॒तम्। वि॒भुर्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय॒ मेधि॑रो द्विमा॒ता श॒युः क॑ति॒धा चि॑दा॒यवे॑ ॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । प्र॒थ॒मः । अङ्गि॑रःऽतमः । क॒विः । दे॒वाना॑म् । परि॑ । भू॒ष॒सि॒ । व्र॒तम् । वि॒ऽभुः । विश्व॑स्मै । भुव॑नाय । मेधि॑रः । द्वि॒ऽमा॒ता । श॒युः । क॒ति॒धा । चि॒त् । आ॒यवे॑ ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरस्तमः कविर्देवानां परि भूषसि व्रतम्। विभुर्विश्वस्मै भुवनाय मेधिरो द्विमाता शयुः कतिधा चिदायवे ॥

त्वम्। अग्ने। प्रथमः। अङ्गिरःऽतमः। कविः। देवानाम्। परि। भूषसि। व्रतम्। विऽभुः। विश्वस्मै। भुवनाय। मेधिरः। द्विऽमाता। शयुः। कतिधा। चित्। आयवे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 32 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) सब दुःखों के नाश करने और सब दुष्ट शत्रुओं के दाह करनेवाले जगदीश्वर वा सभासेनाध्यक्ष ! जिस कारण (त्वम्) आप (प्रथमः) अनादिस्वरूप वा पहिले मानने योग्य (शयुः) प्रलय में सब प्राणियों को सुलाने (मेधिरः) सृष्टि समय में सबको चिताने (द्विमाता) प्रकाशवान् वा अप्रकाशवान् लोकों के निर्माण अर्थात् सिद्ध करने वा तद्विद्या जनानेवाले (अङ्गिरस्तमः) जीव, प्राण और मनुष्यों में अत्यन्त उत्तम (विभुः) सर्वव्यापक वा सभा सेना के अङ्गों से शत्रु बलों में व्याप्त स्वभाव (कविः) और सबको जाननेवाले हैं (चित्) उसी कारण से (आयवे) मनुष्य वा (विश्वस्मै) सब (भुवनाय) संसार के लिये (देवानाम्) विद्वान् वा सूर्य और पृथिवी आदि लोकों के (व्रतम्) धर्मयुक्त नियमों को (कतिधा) कई प्रकार से (परिभूषसि) सुशोभित करते हो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर वेद द्वारा वा उसके पढ़ाने से विद्वान् मनुष्य के विद्या धर्मरूपी व्रत वा लोकों के नियमरूपी व्रत को सुशोभित करता है, जिस ईश्वर ने सूर्य आदि प्रकाशवान् वा वायु पृथिवी आदि अप्रकाशवान् लोकसमूह रचा है, वह सर्वव्यापी है और ईश्वर की रची हुई सृष्टि से विद्या को प्रकाशित करता है, वह विद्वान् होता है, उस ईश्वर वा विद्वान् के विना कोई पदार्थ विद्या वा कारण से कार्यरूप सब लोकों के रचने धारणे और जानने को समर्थ नहीं हो सकता ॥ २ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥